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हे जन जन के राम

हे जन जन के राम पावन तुम्हारा नाम हे राम! नयनाभिराम तुम्हें कोटिस प्रणाम ।। प्रतिरूप आदर्श के पुरुषोत्तम नर श्रेष्ठ धरा पर ... Read more

जग में कुछ कर जाओ तुम

आदित्य उदय पूरब में तन्द्रा तिमिर हटाओ तुम सूरज सुमन से ऊर्जा ले स्फूर्ति मय हो जाओ तुम। मुस्करा के हर कली आतुर कुसुम बनने क... Read more

एक बगीचा

आसमान सा बड़ा बगीचा मैं भी एक लगाऊँगा सूरज होंगे तीन चार पर चन्दा सात उगाऊँगा।। नीले पीले और गुलाबी हर रंग के तारे होंगे ल... Read more

गर्मी और वर्षा

तपती हुई दुपहरीया, तन मन रही जलाइ । अंग अंग सुलगन लगे, कछू न जिया सुहाइ ।। गरम गरम लू कर रही, हर एक को बेहाल । जनु थप्पड़ हों ज... Read more

वह बेचैन..

यूं ही बस नज़र पड़ी वह बेचैन सी खड़ी देखती घड़ी हर घड़ी।। गर्म ज़ज़्वात उगलते पसीना निश्चित ही नहीं था गर्मी का महीना।। शायद ज... Read more

जीवन की डगर

यूं ही घिर आता है कभी-कभी अँधेरा काले बादलों का हृदय में डर बढ़ाता है सांसो में कम्पन लाता है खिच जातीं हैं माथे पर चिन्ता की रेख... Read more

चुन्नू मुन्नू कैसे हो..

चुन्नू मुन्नू कैसे हो ? मुँह लटकाये बैठे हो चलो उठो अब दौड़ लगाओ कूदो भागो मौज मनाओ।। मम्मी जी ने डाँट दिया मोबाइल भी छीन लि... Read more

बिन आँधी ..

कितने ही नभचरों का आश्रय और पथिकों को शीतल छाया देता था मील के पत्थर की तरह सब ताप शीत सह लेता था फूल-पत्तियों और शाखाओं से भरा... Read more

नई हवा चल रही है..

जीवन मूल्यों की प्रतिपल परिभाषा बदल रही है। लालच लोभ प्रपंच की नई हवा चल रही है।। हो गया है बोलवाला फरेब झूँठ बेईमानी का, त्याग... Read more

गुरुवर

हे ज्ञान चक्षु विज्ञान धन हे ज्योति जीवन भास्कर, सुज्ञान अमृत सा दिया मेरे गुरुवर, तुम कृपा कर। अज्ञान का घोर अंधकार थे कल... Read more

विचार..

अक़्सर...ऐसा होता है कि कोई विचार बिन बुलाये मेहमान की तरह चला आता है, ठहरता है मान-मनुहार कराता है सुरसा के मुँह सी बढ़ती महंगाई ... Read more

गुबार बाहर आने दीजिये

किसी की नि:शब्दता को हमेशा यूं न जाने दीजिये, मन टटोलिये, गाँठें खोलिये कुरेदिये..दबे गुबार बाहर आने दीजिये। कौन किस गली में भ... Read more

गुबार बाहर आने दीजिये

किसी की नि:शब्दता को हमेशा यूं न जाने दीजिये, मन टटोलिये, गाँठें खोलिये कुरेदिये..दबे गुबार बाहर आने दीजिये। कौन किस गली में भ... Read more

जिन्दगी..बहती एक नदी

जिन्दगी बहती एक नदी बस बहती चली कहाँ चली...न सोचा न सोचना चाहा; ऊबड़-खाबड़, टेड़े-मेड़े सर्पीले पथरीले पथ चलती चली बहती चली। क... Read more

मेरे पिता..

मुँह को निवाला और घर को छत देते हो मेरे पिता... तुम हम पर जीवन वार देते हो। मेरे जीवन, मेरे सपने, मेरी उम्मीद और आस हो पग-पग प... Read more

चलते चले..

वे चलते चले...... वे-सहारा होके जमे जमाये काम और रोजगार खोके, कन्धों पे गठरी, झोले सन्दूक लेके। छोटे छोटे दुधमुहोँ को गोद मे ढ़ोके... Read more