विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

तोशाम जिला भिवानी हरियाणा

Joined January 2018

मेरा जन्म 5 जून 1978 को कस्बा तोशाम जिला भिवानी के एक साधारण से परिवार में हुआ। मैंने 1998 से ही अपनी लेखनी चलानी आरंभ कर दी थी। तब से लेकर अब तक साहित्य साधना में रत हूँ। अप्रैल 2005 में ‘शब्द शक्ति साहित्यिक संस्था’ के तत्वावधान में आयोजित मेरी कहानी ‘गुनाहों की सजा’ को सांत्वना पुरस्कार मिला। पुष्पगंधा प्रकाशन (2005) कवर्धा (छत्तीसगढ) द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘काव्य-सुमन’ में मेरी कविता ‘अभिलाषा’ के प्रकाशन पर प्रशस्ति-पत्र भेंट किया गया। अब तक मेरी असंख्य रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से कतिपय इस प्रकार हैं-
क). कहानियाँ- गुनाहों की सजा, एक बार फिर आ जाओ, वह चली गई, दोस्ती, मजाक, धोखा, अटूट-बंधन, इंतजार, सपना, प्यार की कुर्बानी, कयामत की रात आदि।
ख). कविताएँ-सपने, चक्रव्यूह, मतवाली बसंत ऋतु, मारें भर-भर कर पिचकारी, वो न आई नैनों के द्वार, आई होली आई होली, सब मेहनत गई बेकार, बेटी बचाओ बेटी पढाओ, फिर रीत पुरानी याद आई, बेटी, वह घूम रही उपवन-उपवन।
ग). ‘डिजिटल पेमेंट फार बेटर टूमॉरो’ कविता को सोशल मीडिया द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।
घ). बाल-कविताएँ-मास्टर जी, डाकिया, तारे, मछली, आगे बढते जाएंगे, सच्चाई व दया दिखाएँ (26 अप्रैल, 2017 को दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित)
ड़) असंख्य अप्रकाशित बाल कविताएं एवं कविताएं।

Books:
लोक साहित्यकार: जयलाल दास

Copy link to share

मां

मां मां ममता की मूरत है हम सबकी एक जरूरत है। बिन मां के घर सूना होता मां एक शुभ मुहुर्त है। जन्म दिया, खुद दर्द सहा ममता का ... Read more

विरासत में मिले संस्कार का विस्तार

बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ विषय पर एक विशेष लघु फिल्म ‘ताई की तकरार’ में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले और हरियाणवीं एलबम ‘काच्चा टमाटर’ क... Read more

आम का पेड़

मेरे घर के आंगन में लगे आम के पेड़ ने मुझसे कहा देखो, फाल्गुन के मस्त महीने में मुझ पर बोर लगने लगे हैं। मतवाली कोयल कूकने लगी है... Read more

रंगों से रंगना सीखो

रंग तो आखिर रंग होते हैं बदला नहीं इनका स्वरूप। दौलत की खातिर लोगों ने धारे हैं भांति-भांति के रूप। स्वार्थ की स्याह से मलिन ... Read more

आई होली

भीगी चुनरिया भीगी चोली आई होली, आई होली। रंग, गुलाल, अबीर, पिचकारी भर-भर लाई मस्तों की टोली गिले-शिकवे सब वैर पुराने आज मिटाने ... Read more

कतरे-कतरे का होगा हिसाब

इक दूजे की होड़ में भाग रहे हैं सब। मंजिल नजर आती नहीं लक्ष्य सधेगा कब। आपाधापी का है मंजर पैसा बन गया है रब। रिश्तों का कत्... Read more

घर-घर मोदी का उद्घोष

दामोदर के लाडले, हीराबेन के लाल नरेंद्र मोदी भारत में, बने हैं एक मिसाल। बुलगारी का चश्मा, रखते मॉ ब्लां का प... Read more

गुरू

बिन गुरू कै ज्ञान नहीं, गुरू बिना नहीं मान गुरू ए सबनै पार लगावै, बणकै एक पतवार। संस्कारां का मींह बरसावै, सच्चाई की राह दि... Read more

फाकाकशी की जिंदगी

वर्मा जी टकटकी लगाए टी.वी. पर समाचार सुन रहे थे। उनकी धड़कनें तेज थी। कहीं इस बार भी जज महोदय ने पीजीटी शिक्षकों के परीक्षा परिणाम जा... Read more

रिश्तों का मोल

बंधन रिश्तों के इस जग में क्यों कच्चे पड़ने लगे हैं यारो। टूट रहे हैं परिवार यहां पर क्यों सांझे चूल्हे घटने लगे हैं यारो। बिन... Read more

बुढ़ापे के दिन

राम कथा में श्री राम चंद्र जी का जो चरित्र मुखरित हुआ है, यदि आज का इंसान उससे प्रेरणा लेता, तो शायद ! वृद्ध-आश्रम का नामोंन... Read more

जीवन

जीवन दो धारी तलवार। नहीं जाता खाली इसका वार। - विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’ Read more

दरकार

भला किसे कब होती है, दोजख की दरकार तमोगुणी भी करता है, सुरग का इंतजार। Read more

पतवार

अपने-अपने हिस्से में है, सुख और दुख की पतवार मांझी जिसको जैसा मिला, लगा दिया भव पार। Read more

भिवानी के साहित्यकार आनन्द प्रकाश आर्टिस्ट की कहानी ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ को मिला तीसरा स्थान

अभी हाल ही में घोषित हुए हरियाणा साहित्य अकादमी पुचकूला द्वारा आयोजित हिन्दी कहानी प्रतियोगिता वर्ष 2016 के परिणाम में भिवानी के साह... Read more

बाल-विवाह सरीखी कुप्रथा पर कड़ा प्रहार करता उपन्यास: ‘कच्ची उम्र’ -विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

पुस्तक समीक्षा: पुस्तक: कच्ची उम्र लेखक: धर्मबीर बडसरा प्रकाशक: शब्द-शब्द संघर्ष, मयूर विहार, गोहाना रोड़, सोन... Read more

साक्षात्कार: फोन पर एक वार्तालाप: डाॅ. लालचंद गुप्त ‘मंगल’ के साथ

साक्षात्कार: फोन पर एक वार्तालाप: डाॅ. लालचंद गुप्त ‘मंगल’ के साथ - विनोद वर्मा ‘दु... Read more

आर्टिस्ट महाबीर वर्मा

कला किसी की मोहताज नहीं होती। कलाकार कला का पुजारी एवं पारखी होता है। कला उसकी नेमत और इबादत हेाती है। जब कला किसी की नस-नस में समा ... Read more

एक दिन कलाकार कुणबे के साथ

एक दिन कलाकार कुणबे के साथ - विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’ मेरे प्रस्तुत यात... Read more

आज इंसान कम दानव ज्यादा

आज सच बेबस, ईमान छला-सा और नेकी ठगी-सी महसूस कर रही हैं। भ्रष्टाचार की जड़ें शनैः-शनैः बढ़ रही हैं समग्र जग को पल-प्रतिपल ... Read more

कैसा यह हुआ सवेरा है

इंसान नहीं है एक यहां जन-जन हुआ लुटेरा है। ढ़ोंगी और फरेबी देखो घर-घर डाले डेरा हैं। कदम-कदम पर हैं नाग यहां कदम-कदम पर सपेरा है... Read more

मेरी तरह प्यार में ........

उसकी पायल की मधुर आवाज आज कर्कश-सी और कुछ अधूरापन-सा बया कर रही है, उसकी रूनझुन ध्वनि मेरे कान के पर्दों को चीर रही है। ... Read more

जितनी चादर हो उतने ही पांव पसारें

गगनचुंबी महल, नोटो भरी तिजोरियां किसे सुकुन देते हैं, कब चैन की नींद सोने देते हैं। पैसा सिर्फ तृष्णा बढ़ाता है, बेचैनी बढ़ाता ... Read more

सच्चा प्यार मुझे मिला नहीं

वो मगरूर है, इस बात का गिला नहीं गिला है इतना, सच्चा प्यार मुझे मिला नहीं। बेवफाई उसकी फितरत ही सही वफा का कतरा भी उसमें मिला न... Read more

हंसी नहीं आई

हंसना तो चाहा मगर हंसी नहीं आई मेरे लबों पर जाने क्यूं चुप्पी छाई। दूर-दूर तक जहां मेरी नजर गई हर शै में मुझे वो ही नजर आई। ... Read more

आज का अभिमन्यु

आज फिर अभिमन्यु चक्रव्यूह में घिर गया, परंतु यह चक्रव्यूह कौरवों द्वारा नहीं रचा गया वरन् नैतिक मूल्यों के ह्रास ने खुद ब खुद... Read more

बिछड़ कर जीने की तरकीब बना ली हमने

बिछड़ कर जीने की तरकीब बना ली हमने पीकर अश्क, लबों पर हंसी सजा ली हमने। शिकवा न गिला हम तेरी बेवफाई का करेंगे यह कसम आज तेरे सर की... Read more

मेरी कविताएं

मेरी कविताएं दिशाहीन, किंतु भावपरक हैं, इनमें न तो गेयता है, और न ही कवि-सी पैनी दृष्टि, सिर्फ शब्दों का लबादा ओढ़े मेरी कव... Read more

फिर रीत पुरानी याद आई

फिर रीत पुरानी याद आई झूठे रिश्ते-नातों पर कायम अधुनातन जग का आलम, छल-कपट और राग-द्वेष में संलिप्त कलियुग का मानव। मानवता दम ... Read more

शोधपरक दृष्टि का परिचय देती एक कृति ‘मेरे शोध-पत्र’

पुस्तक समीक्षा: पुस्तक: मेरे शोध-पत्र लेखक: आनंद प्रकाश ‘आर्टिस्ट’ प्रकाशक: सूर्य भारती प्रकाशन, नई सड़क, दिल... Read more

परिवेश और आदर्शवादिता का परिचय देता कहानी संग्रह ‘कितने पास कितने दूर’

पुस्तक समीक्षा: पुस्तक: कितने पास कितने दूर लेखक: आनंद प्रकाश ‘आर्टिस्ट’ प्रकाशक: सूर्य भारती प्रकाशन, नई सड़... Read more

शीतलहर की हुई विदाई

दिनकर ने ली अंगड़ाई शीतलहर की हुई विदाई। खुल गई हैं फिर से शाला पैक हो गए स्वेटर और दुशाला। धुंध-कोहरा अब न कंपकपाएं रफ्तार ... Read more

भारत माता तुम्हें बुलाती

वीरों की शहादत के बदले हमने आजादी पाई थी। बरसों अंग्रेजों का जुल्म सहा तब हमने आजादी पाई थी। त्राहि-त्राहि चहुं ओर मची थी क... Read more

मां ममता की मूरत है

मां ममता की मूरत है सबकी एक जरूरत है। अपने सुख की परवाह नहीं बच्चों का शुभ मुहूर्त है। कोख में पाला नौ महीने दर्द सहा था नौ म... Read more

प्रीत के धागे नाजुक हैं

मैं हारा तुम जीते, क्या फर्क पड़ता है छोटी-छोटी बातों से, रिश्ता टूट बिखरता है। तुम जीत पर इतरा लो, मैं हार का जश्न मना लूंगा ते... Read more

हम यूं ही इतराते थे

हम यूं ही इतराते थे हम बिन कह रह जाते थे वो नयनों से तीर चलाते थे। घायल, चोटिल दिल हो जाता वो मरहम तक ना लगात थे। जुल्फो... Read more

नव वर्ष अभिनंदन

कुहरे की रजत चादर ओढे अलसाया सा आया मार्गशीर्ष, ठिठुरन, कंपन और शीतलहर संग समेटे लाया मार्गशीर्ष। चुप्पी साधे और अकुलाते दाद... Read more

आई बैशाखी की रेल

झिलमिल करती कनक बालियाँ दिनकर की तपिश किरणों से, शबनमीं समीर में सरपट दौड़ी आई बैशाखी की रेल । हलधर खेतों को कूच कर रहे लेकर ... Read more

बेटी बचाओ, बेटी पढाओ

शबनम की बूंदों का दर्पण स्नेह की निर्मल धारा-सी। घर के आंगन की फुलवारी बेटी भोर का तारा-सी। अपना भाग्य लिखवा कर आती सुख-दुख क... Read more

वह घूम रही उपवन-उपवन

पुष्पों सी नजाकत अधरों पर नवनीत-सा कोमल उर थामे। एक पाती प्रेम भरी लेकर वह घूम रही उपवन-उपवन। सुर्ख कपोलों पर स्याह लटें धान... Read more

बेटी

सर्दी की छुट्टियों में बेटी जब अपने चाचा के घर चली गई। माँ की यादों ने उसको घेरा एक पल भी ना वो वहां रही। माँ के साये में पल-प... Read more

अभिव्यक्ति

अभिव्यक्ति को किसी की कौन दबा पाया है। यह वो ज्वालामुखी है जिससे विपक्ष भी थर्राया है। अंतस के उद्गारों को कवि साधता है पल-प्... Read more