माँ

जब भी आता हूँ घर से मैं, यूँ क्षुब्ध होकर देखती है मेरी माँ जैसे बिछड़ रहा हो उसका चाँद आज गगन से। वो माँ की आँखों के निशब्द आ... Read more

माँ भारती

भोर हो गयी अब, रण में लड़ने जाऊँगा पीकर लहू शत्रु का, अपनी प्यास बुझाऊंगा बहुत देख चूका लहू अपनों का, अब चुप कैसे रह पाऊंगा कस... Read more