Vijendra Singh

Joined January 2017

बार-ए-नदामत ढोते – ढोते, तुम बूढ़े हो जाओगे
ख़ाक न डालेगी ये दुनिया, जब दामन फैलाओगे |
इस अहसास के मारे लोगो ! गिर के संभल न पाओगे
ग़ैर को पस्ता-क़द कहने पर, खुद छोटे हो जाओगे |
अब खाली कशकौल संभाले, और कहीं जाओ बाबा
गूंगे-बहरों की नगरी में, कब तक शोर मचाओगे !
शौहरत के उजले ख़्वाबों का हश्र न जाने क्या होगा ?
अपनी क़ब्र में ओढ़ के पत्थर जब तनहा सो जाओगे |
बच्चों ! फ़िक्र तुम्हारी ठहरी, मुझको कब सैय्याद का डर ?
जब मैं उड़ने निकलूंगा, तुम भी पर फैलाओगे |
इंसानी जज़्बात पै तुमने, ठानी है पाबंदी की
इसका मतलब ये है, हवा को ज़ंजीरें पहनाओगे |
कहती हैं ‘परवाज़’ ये हमसे, बाम-ओ-दर की खामोशी
घर से रुख़्सत होने वालो ! कब तक वापिस आओगे |

Copy link to share

बरसों मीनाकारी की

वक़्त ने इंसानों के हक़ में , ये कैसी ग़द्दारी की सादालौही सीख रही है, कुछ बातें अय्यारी की बाज़ारों तक आते - आते ज़ंग लगा बेकार हुआ ... Read more