Vijay Sahani

Joined September 2017

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*अपना ही आशीयाना*

विधा--- गजल अपना ही आशीयाना यू ना जलाइये . क्यू बदला है मिजाज कुछ तो बताइये ॥ कल तक तो कुछ न था क्या आज हो गया दिल मे... Read more

*स्वार्थी मानव*

स्वार्थ मे जन्न्मा स्वार्थी मे पनपा स्वार्थ से उसका नाता है। बिन स्वार्थ के कैसे जीये उसको यह न... Read more

मानव जीव

कहा से आया कैसे आया, यह सोच नही पाता है। पूरी जीवन सोच-सोच के, आँसू वह गिराता है। जब आया वह इस दुनिया में, ... Read more