Dr. Vijendra Pratap Singh

Sikandra rao

Joined September 2016

साहित्य के लिए और साहित्य के साथ। मेरी पुस्तकें- साहित्य विविधा, व्यतिरेकी भाषा विज्ञान, वंचित संवेदना का साहित्य (दलित विमर्श), वंचित संवेदना का साहित्य(स्त्री विमर्श), वंचित संवेदना का साहित्य (आदिवासी विमर्श), ब्रज का भाषा विज्ञान, आदिवासी चेतना के नए स्वर, विमर्श का तीसरा पक्ष:थर्ड जेंडर, भारतीय साहित्य तथा समाज में तृतीय लिंगी विमर्श, उपन्यासों में आदिवासी चेतना

Books:
14

Awards:
02

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यथार्थ

क्या साथ लाएं थे क्या साथ ले जाएंगे कहते अक्सर लोग जूठे लोग झूठा जीवन जीते लोग सब जानते हैं न जाने कितने अपूर्ण सपने अधू... Read more

अंदर का सच

अंदर का सच (लघुकथा) बहुत ही सुसभ्‍य, संयंमित, व्‍यवहार कुशल इंसान था वो जिसके व्‍यवहार को साथी कर्म... Read more

अपने बाप से बाप कहूंगा

अपने बाप को बाप कहूंगा अमर दलित समुदाय का एक नौकरीपेशा व्यक्ति था। वह जब भी अपने समाज के लोगों के सामने होता उन्हें पढ़ने लिखने और... Read more

गौरैया

बहुत जगह पढ़ा बहुत लोगों से सुना कि अब गौरैया नहीं दीखती नहीं दीखती अब गौरैया सन् 2011 के 30 अक्टूबर को मेरे घर जन्मी एक गौरैया... Read more