Umesh Kumar Sharma

कोलकाता

Joined July 2019

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। अपने इर्द गिर्द जो कुछ देखता या महसूस करता हूँ उनकी अभिव्यक्ति लेखनी के माध्यम से होती है

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शिव कुमारी भाग १४

तीज त्यौहारों में उनकी जान बसती थी। सावन की तीज पर तो उनका गांव में प्रसिद्ध झूला डलता था। घर के बाहर नीम के पेड़ ने अपनी चौथी ... Read more

शिव कुमारी भाग १३

वो किस्से , कहानियों और लोक मुहावरों की एक कोष ही तो थीं। उनकी किस्सागोई के सभी तलबगार थे घर में। रात के वक़्त खाना खाने के बाद हम ब... Read more

मारवाड़ी हास्यरस

दृश्य १ परसा, किसी के बेटे के तिलकोत्सव से नंगे पांव भुनभुनाते हुए तेजी से घर की ओर लौट रहा था। रास्ते में एक घर के बरामदे मे... Read more

फुलपैंट

रवि कांत चौबे जी १९६६ में जब कोलकाता राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए आये, तो कुछ दिन अपने रिश्तेदार के पास बैरकपुर मे... Read more

शिव कुमारी भाग १२

दादी घर के पेड़ पौधों की भी माँ ही थीं। सारे उनके हाथ के ही लगाए हुए थे या फिर उनकी देख रेख में लगे थे। परिवार बढ़ने पर जब ठाकुरबाड़ी ... Read more

फिल्मों का वो दौर

सत्तर और अस्सी के वो दशक जो गांव में गुज़रे थे, उसमें फिल्में जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। टेलिविजन उस समय न के बराबर थे और शु... Read more

भाषा का बोझ

गांव की राजस्थान क्लब के सदस्यों द्वारा कुछ दिनों बाद एक नाटक का मंचन होना था। ये क्लब हिंदी भाषियों की सांस्कृतिक गोष्ठी की जगह... Read more

शिव कुमारी भाग ११

चचेरी दीदी की शादी तय होनी थी। उनके लिए जब लड़का देखने झरिया गए, तो मैं भी गया था। बात पक्की करके जब ट्रेन से लौट रहे थे तो आद्रा स्... Read more

स्याही

उस वक्त प्राथमिक विद्यालय से उच्च विद्यालय पहुंचने के बीच एक बोर्ड की परीक्षा की दीवार होती थी। उसको फलांगने पर ही उच्च विद्यालय म... Read more

विजय भैया

विजय भैया उर्फ बिज्जू भैया, बचपन में हमारे घर पर रहे। मेरी ताईजी उनकी बुआ लगती थी। मामाजी ने जमशेदपुर से हमारे यहां पढ़ने भेजा था... Read more

शिव कुमारी भाग १०

अब तो वो पुश्तैनी घर वैसा नही रहा, पक्का मकान बन चुका है पर आँख बंद करते ही एक कच्चा मकान आज भी साफ साफ दिखाई देता है। घर की दहलीज... Read more

शिव कुमारी भाग ९

दादी जब थोड़ी थोड़ी समझ मे आने लगी थी तो वो लगभग ८७-८८ वर्ष की हो चुकी थी, पूरा तो उनको दादाजी भी नहीं समझ पाए होंगे, वे भी आश्चर्यचक... Read more

शिव कुमारी भाग ८

दादी ने कभी घड़ी नही पहनी। घड़ी पहन भी लेती तो भी उसमे लिखे अंक और संकेत वो समझ नही पाती। फिर भी समय की सुई उनके मस्तिष्क मे निरं... Read more

दयाशंकर जी की अलौकिक शक्तियाँ

लगभग ६०-७० वर्ष पहले की बात होगी। पंडित दयाशंकर जी का गांव मे काफी रुतबा था। विद्वान और कर्मकांडी थे। गांव के शिव मंदिर में पुजारी... Read more

शिव कुमारी भाग ७

दादी को अपने पोते , पोतियों की अपेक्षा ज्यादा प्यारे थे। इस रूढ़िवादी विचारधारा से वो अछूती न रहीं। खुद एक औरत होकर भी वो इस मानस... Read more

शिव कुमारी भाग ६

घर के बाहर दहलीज़ पर दादी की अदालत बैठती थी। मुहल्ले के एक हिस्से मे, मजदूरों और रिक्शेवालों की चंद झोपड़ियां थी। गरीब लोग पैसे की... Read more

शिव कुमारी भाग ५

दादी की कुशल चिकित्सा और तीमारदारी से मेरे चेचक के दाने सूखने लगे थे। मेरे खाने पीने का पूरा ख्याल रखती थी , बीच बीच मे चौके मे जाक... Read more

बेटी के घर का पानी

पुरानी मान्यता थी कि एक बार जिस घर बेटी ब्याह दी , फिर उस घर का पानी भी नहीं पिया जाता था। इसके पीछे का तर्क तो नहीं मालूम, कुछ रहा... Read more

शिव कुमारी भाग ४

मुझे जहाँ तक याद आ रहा है, दादी से मेरी पहली औपचारिक बात चीत मुझे जब चेचक निकली थी तब शुरू हुई थी। उस वक़्त मेरी उम्र तीन चार वर्ष रह... Read more

दुकानदार का हिसाब किताब

गांव में उन दिनों चोरी डकैती आम बात थी। डकैत जब मन करता धमक पड़ते , दो चार को लूटते और धमकी देते हुए निकल पड़ते कि खबरदार जो पुलिस को ... Read more

शिव कुमारी भाग ३

शिव कुमारी भाग ३ मेरी शिव कुमारी से मुलाकात 53 वर्ष पहले हुई थी। अब मैंने माँ के पेट से बाहर आकर सांस लेनी शुरू कर दी थी। पहली बा... Read more

आत्मग्लानि बोध से मुक्ति

वैसे तो अनूप एक सीधा साथ लड़का ही था। पढ़ने लिखने में भी ठीक ही था। सांतवीं की छमाई की परीक्षा हो चुकी थी। विद्यालय के मैदान में उसक... Read more

शिव कुमारी भाग १

शिव कुमारी का जन्म राजस्थान के एक कस्बे राजगढ़(शार्दुलपुर) मे लगभग १३३ साल पहले हुआ था। पिता बजरंग लाल जी की ये लाड़ली बेटी एक दम दूधि... Read more

सोचमग्न

लोधा जी को कुछ न कुछ सोचने की बीमारी थी। पता नही अपने खयालों मे डूबे विचारों के गहरे सागर की किस तह पर बैठे रहते थे कि प्रत्यक्ष मे ... Read more

मझली दीदी

बचपन में माँ द्वारा दी जाने वाली अक्षरज्ञान की दीक्षा के असफल प्रयासों की हताशा के बाद जब उनकी ये चिंता प्रबल होने लगी कि उनका ये ना... Read more

दीपू

गांव के मैदान में क्रिकेट का अभ्यास खत्म होने के बाद, कुछ देर पास के एक पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताने का कार्यक्रम होता। हल्की फुल्... Read more

क़तील शिफ़ाई

संजय भाई अपने आप को साहित्यिक किस्म का इंसान समझते थे। इस वजह से दोस्तों मे उनका थोड़ा रौब और इज्जत भी थी। कोलकाता की बड़ाबाजार लाइब... Read more

कालूराम

बचपन में ये नाम रंग को देखकर उसके मामाजी ने मजाक मजाक में दे डाला था जो एक सफल व्यवसायी तो थे ही, साथ ही संगीत में भी निपुण थे। ... Read more

विवेक भैया

उनसे मेरी मुलाकात एक परिचित के माध्यम से हुई थी। वो उनके यहां अपनी शिक्षा के तहत अभ्यासिक प्रशिक्षण ले रहा था। विवेक भैया की अपनी... Read more

लाल पान का गुलाम

दो चचेरे भाई अलग अलग शहरों में जाकर पढ़ने लगे थे। साथ ही पले बढ़े थे, एक दूसरे से अच्छी तरह से वाकिफ भी थे। कॉलेज का आखिरी साल था... Read more

अमूल्य बाबू

अमूल्य बाबू अपने आप में एक शिक्षा संस्थान थे। गांव से निकले अधिकांश होनहार छात्र उनके मार्गदर्शन और ट्यूशन क्लास से होकर ही किसी न क... Read more

बाल उद्यमी बिज्जू

मेरी चचेरी बहन का लड़का बिज्जू(विजय) बचपन में ही हमारे यहाँ रहने आ गया था। दीदी जब मायके आयी तो बड़ों ने कहा इसे यहीं रहने दो। यहाँ और... Read more

पूजा अर्चना

सेठ जी के बगीचे में एक सुंदर मंदिर बना हुआ था। स्कूल के ठीक बगल में था, कभी कभी हम द्वार खुला होने पर चले भी जाते थे। बगीचे के रा... Read more

पानीपत की तीसरी लड़ाई

दो चचेरे भाई एक ही घर में पले बढ़े ।उम्र में भी कोई चार पांच महीनों का ही फर्क होगा। एक बिल्कुल गोरा चिट्टा तो दूसरा साँवला पर आँ... Read more

शिल्पी दी

शिल्पी दी को पहली बार नज़दीक से हॉस्पिटल रोड में अपनी एक महिला मित्र के साथ टहलते देखा था। लंबी सी फ्रॉक पहने , दुबला पतला शरीर, गोर... Read more

संबोधन

स्कूल के दिनों में बड़ी कक्षाओं के छात्र छात्राओं की हम पर थोड़ी धौंस तो चलती ही थी। उनके छोटे मोटे काम और आदेश मानना हम अपना कर्तव्य ... Read more

लत

मेहनतकश मजदूर, रेवड़ी और रिक्शावालों में देशी शराब की लत तो उन दिनों आम बात थी। उसको इतना बुरा भी नहीं समझा जाता था, तर्क ये था कि दि... Read more

सुधार अभियान

उस जमाने में चावल, गेहूँ, दाल, गलत संगति में पड़ने के कारण अक्सर जब घर आते थे कमबख्त बिगड़े हुए ही आते थे। अब इसमें इनकी कोई गलती ... Read more

दादी के हाथ की चाय

साल में एक आध बार, जब कभी माँ या ताई जी के हाथ की बनी चाय को बेस्वाद कह कह कर दादी जब पूरी तरह से ऊब जाती, तो अचानक दोपहर के तीन... Read more

इंतजार

आज रवि पूरे एक साल बाद घर लौट रहा था। वैसे टेलिफोन पर तो घरवालों से लगभग रोज ही बात होती थी। पर आवाज अकेली काफी कहाँ होती है। सुब... Read more

कच्चा रंग

उस दिन जब मिले थे, मुस्कुरा कर नजरे ठहरी हाथ भी बढ़े पर सिर्फ"कैसे" कहकर ही, नजरें किसी और को तलाशने लगी, फिर बिना कुछ कहे... Read more

पार्क के जोड़े

दुनिया से बेखबर एक दूसरे की आंखों मे आंखे डाले हुए भविष्य के सपनो मे खोये कुछ मंझे हुए अपनी आगे की रणनीति विचारते पिछले अ... Read more

नशा

आज हीरा और बुधिया एक साल बाद गांव लौटे थे। दोनों पास के शहर में कोयले की खदान में मजदूरी करते थे। दोनों को तनख्वाह के अलावा तीन महीन... Read more

प्रेम ऐसा भी

घर से कुछ दूर मजदूरी करने वाले और रिक्शाचालक छोटी छोटी झोपड़ियों में रहते थे। बचपन में रोज घर के सामने से गुजरती वो दिख ही जाती ... Read more

आवृत्ति पाठ

दुर्गा पूजा के समय पूरे सप्ताह उत्सव का माहौल बना रहता था। महालया के दिन सुबह सुबह वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की ओजस्वी वाणी में रेडियो प... Read more

ताऊजी की सगाई

मेरे मझले नानाजी टाटानगर के प्रसिद्ध पुरोहित व विद्वान व्यक्ति थे। अपनी ज्येष्ट पुत्री के संबंध के लिए रिश्ता तलाश रहे थे, तो कि... Read more

हवा और कानों का रिश्ता

गर्मियों में रात जब कभी उमस भरी होती थी और हवा का कहीं नामोनिशान नहीं होता था, तो दादी को हवा से प्रार्थना करते हुए देखते थे कि ... Read more

धौंस

पहले धौंस की अपनी एक सड़क हुआ करती थी, जो विदेशों से निकल कर महानगरों मे पहुँच कर नगरों, शहरों, कस्बों से होती हुई खीझती ... Read more

रेलगाड़ी और गोल

आज गांव के मैदान में दूर के एक छोटे से गांव बांदवान की फुटबॉल टीम के साथ मैच था। दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मैदान के प... Read more

श्राद्ध भोज

बहुत पहले की बात है गांव के किसी यजमान ने पितृ पक्ष में वार्षिक श्राद्ध के लिए मेरे दादाजी के बड़े भाई को न्यौता दिया। वो देखने मे ... Read more