Umesh Kumar Sharma

कोलकाता

Joined July 2019

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। अपने इर्द गिर्द जो कुछ देखता या महसूस करता हूँ उनकी अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से होती है

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ओंस की बूंदों सा

वो जिंदगी है हर पल, नवीनता लिए अपनी सारी अल्हड़ता अपना चुलबुलापन कुछ भी तो नही खोया है उसने वक़्त के इस छोर तक बचा लायी है वो स... Read more

पहला अहसास

उसकी मुस्कुराती हुई नम होती आँखें मेरी सुप्त खुशियों को अंदर तक भिगोती रही एक अनजाना अहसास जो कभी था मेरे भीतर शायद बचपन के क... Read more

तुम्हारे आने से

ताजगी पहन सिमटा सा मन खुलने लगा है तुम्हारे आने से बिखरता वक़्त ठहरा सा लगता है नई आहट से तुम्हारी आँखों में लहराती एक श... Read more

विरह-५

मेरे घर की आबादी में शामिल है मेरी तन्हाई और हर पल गूँजता एक सन्नाटा निबाह ही लेता हूँ इनके साथ किसी तरह खामोशी से हां,... Read more

विरह-४

शाम ढलते ही तेरे खयालों की चुभन और एक उफनता ख़ालीपन बना जाता है माथे पर एक शिकन रोज की तरह लम्हों की सीढ़ियां बढ़ा लेती है कद... Read more

सीमारेखा से परे

लहराती शाख से टूटकर पत्ते अचानक उसे बेलिबास कर गए शिकायत जो की दबी जुबाँ में हवाओं से तो बेरुखी से भरी बोली अब तेरे आगो... Read more

विरह-3

तन्हा सा आधा अधूरा मेरे फलक का चांद मुँह छुपाए हुए नजरें उठी एक बेसाख्ता हंसी के साथ उसे हाले शरीक देख कर काली घटा के साये ... Read more

विरह-2

जिंदगी से बहुत दूर वो एक अलग सा मुकाम जहाँ घिसटते दिन बेख्वाब रातों से मिलकर दिलाशा भी नही देते बस एक अंतहीन चुप्पी साधे अपनी ... Read more

विरह-१

मेरे बिस्तर के उस हिस्से में जहां तेरा बसेरा था अब वहां बिखरे पड़े हैं तेरे ख्वाब मैंने डाल दी अपनी तन्हाई की चादर इस इजाजत क... Read more

नकाबे

आ मिलकर ढूंढें एक नया अहसास अपनी नकाबे उतारकर शक्लें बदली सी होंगी पर घबरा मत यही हैं असली अक्स अपने बस परतें उतरी हैं झिझक... Read more

परिभाषित रिश्ते

सब कुछ तो मिला जो चाहा था फिर क्यूं बिछता है मन ओंस की बूंदों सा एक नई सुबह की चाहत मे दिलों मे गर्मजोशी कहीं गुम सी हुई ... Read more

एक विरह पाती- यूँ भी

जो भी लिखा है तुझको ,खयालों की गर्द है हम चैन से हैं भाई , यहां किसको दर्द है ना ये हिज़्र-ए-यार होता, ना ये खयालो ख्वाब होते तो... Read more

गुमशुदा

ये हाय हेलो का मौसम, ये तकल्लुफ से भरी बातें बेजान से इस शहर में ,जिन्दादिली सजा है ये लिपे पुते से चेहरे, ये थकी थकी निगाहें र... Read more

उदास शाम

एक उदास शाम मेरी तरह रोशनी से विदा लेती दो चार कदम बढ़कर मुड़कर देखती आस की नजरों से अनकही हूक दबाये बोझिल सांसें संभालती हा... Read more

बेटी

एक नन्ही सी बच्ची मेरे पेट पर लेट कर नाचकूद कर अपने छोटे भाई की शिकायत का पुलिंदा लेकर मुँह चिढ़ाते हुए खिलखिलाते हुए एक दिन अ... Read more

नया इंक़लाब

मुझको मेरा हक़ मिला तू रह गया तो मुझको क्या मैं किनारे लग गया तू बह गया तो मुझको क्या मैंने चींख चींख कर डंडे से मसला तय किया ... Read more

एक छोटी सी बच्ची की अर्जी भगवान के नाम

विनती सुनलो हे भगवान जब जब भी हो टीवी ऑन हर चैनल हो कार्टून वाला बस इतना सा दो वरदान नही चाहिए स्टार न्यूज़ नही चाहिए आज तक स... Read more

अनकहा सा कुछ

सोचता हूँ अक्सर कि तेरे और मेरे बीच जोअलग सा है उसे एक नाम दे डालूँ, एक अलग सी परिभाषा शब्दों के बेतुके जोड़तोड़ से परे ज... Read more

पहचान

मैं आज फिर लड़ लिया उससे आप से मैं लड़ नही सकता पता नही कब कौन सा मसला खड़ा हो जाये और बात कहाँ से कहाँ पहुंच जाए दरअसल, मेरे और... Read more