विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। ‘कर्फ्यू में शहर’ काव्य संग्रह मित्र प्रकाशन, कोलकाता के सहयोग से प्रकाशित। सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन, दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन, वेस्ट बंगाल : एट ए ग्लांस जैसी बहुचर्चित कृतियां ‘उपकार प्रकाशन’ से प्रकाशित। प्रत्येक चार माह पर समसामयिक सीरीज का लगातार प्रकाशन, ‘अंचल भारती’ पत्रिका का सह-सम्पादन ।

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कर्फ्यू में शहर
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दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन,
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गीता के स्वर (18) संन्यास व त्याग के तत्त्व

काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास और कर्मों के फल त्याग को ‘त्याग’ के रूप में परिभाषित करने की प्रचलित धारणा है. ‘संन्यास’ व ‘त्... Read more

गीता के स्वर (17) श्रद्धा

रूचि के अनुसार होती है ‘श्रद्धा’ अस्तु, श्रद्धा का पृथक्-पृथक् होना स्वाभाविक है. देखें- सात्त्विक की श्रद्धा किसमें होगी ? न... Read more

गीता के स्वर (16) परमगति का मार्ग

‘भय’ क्या है ? इष्ट वियोग और अनिष्ट का संशय ‘भय’ है और इसकी निवृत्ति ‘अभय’. ... ‘दान’ क्या है ? न्यायोपार्जित धन प्रदत्त कर... Read more

गीता के स्वर (15) पुरुषोत्तम

वेदवेत्ता कौन होता है ? ‘अश्वत्थ’ वृक्ष का परिचित जिसके पत्ते होते हैं ‘वेद’ ‘अश्वत्थ’ केवल एक वृक्ष नहीं इसमें समाया है समस्... Read more

गीता के स्वर (14) परम ज्ञान

ज्ञानों में श्रेष्ठ है ‘परम ज्ञान’ यह प्रलय काल में भी साथ देता है व्यथित नहीं होने देता. प्रकृति से उत्पन्न ‘सत्त्व’, ‘रज’ और ... Read more

गीता के स्वर (13) क्षेत्रक का प्रयोजन

एक क्षेत्र है यह शरीर और इसका ज्ञाता ‘क्षेत्रक’ समस्त क्षेत्रों में यह ‘क्षेत्रक’ परम है ‘क्षेत्र’ व ‘क्षेत्रक’ का स्वरूप भिन... Read more

गीता के स्वर (12) प्रभु से निकटता

प्रभु से परायण उद्धार कर देता है मृत्युरूपी संसार-सागर से वह तो परम प्राप्य है योग है चित्त की स्थिरता न होने पर निष्ठावान क... Read more

गीता के स्वर (11) परम ऐश्वर्यरूप

कमलपत्राक्ष ! आकांक्षी हूँ आपके पूर्ण रूप दर्शन का ओह ! तो देख मेरे एक ही रूप में- अष्ट वसुओं, ग्यारह रूद्रों दोनों अश्विनी कु... Read more

गीता के स्वर (10) बुद्धियोग व विभूति

प्राणियों की असंख्य मनोवृत्तियाँ- यश-अपयश, सुख-दुःख, तप-दान सब उद्भुत हैं सर्वशक्तिमान से. महाबाहो ! मैं ही हूँ सबकी उत्पत्ति ... Read more

गीता के स्वर (9) उपासना

उपासना ‘नृप’ का पर्याय है समस्त विद्याओं का और गुप्त रखने योग्य भावों का भी. यह समर्थ है उस ब्रह्म का दर्शन कराने में जो परमपि... Read more

गीता के स्वर (8) स्मरण भाव की श्रेष्ठता

‘ब्रह्म’ क्या है ? परम ‘अक्षर’ है ‘ब्रह्म’ ‘अक्षर’- जिसका नाश न हो अविनाशी है यह ‘ब्रह्म’ अध्यात्म क्या है ? ‘स्वभाव’ है अध्या... Read more

गीता के स्वर (7) ब्रह्म और ज्ञानी

मैं ही हूँ ‘ब्रह्म’ अष्ट प्रकृतियों का धारक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और मन, बुद्धि तथा अहंकार यही तो हैं मेरी अष्ट प्रकृति... Read more

गीता के स्वर (6) संन्यासी और योगी

संन्यासी कौन है ? कौन है योगी ? ‘कर्मफल’ की चिन्ता से मुक्त ‘कर्तव्य कर्म’ में अग्रसर संन्यासी है, योगी है, जो कर्म करता है अन... Read more

गीता के स्वर (5) कर्मयोग बनाम ज्ञानयोग

फिर प्रश्न- कर्मों का संन्यास- ‘ज्ञानयोग’ या फिर ‘कर्मयोग’ कौन श्रेष्ठ है ? उत्तर मिलता है- दोनों कल्याणकारी हैं पर ‘कर्म संन... Read more

गीता के स्वर (4) अवतार का रहस्य

‘कर्मयोग’ परम्परागत है नवसृजन नहीं सूर्य-मनु-इक्ष्वाकु सबने इसे अंगीकार किया है पर क्रमशः नष्ट हो गया यह वेदान्तवर्णित उत्तम रह... Read more

गीता के स्वर (3) कर्मयोग

समस्त प्राणी ‘अन्न’ से आवृत्त हैं जिसे उत्पन्न करता है ‘मेघ’ जो प्रतिफल है ‘कर्म-यज्ञ’ का. यह चक्र है, अनुकरणीय जो चलता रहता ... Read more

गीता के स्वर (2) शरीर और आत्मा

पार्थ ! बिना अवसर के शोक क्यों ? और प्रारम्भ हुआ ‘गीताशास्त्र’ का अद्वितीय उपदेश- ‘गतासु’- मरणशील शरीर और ‘अगतासु’- अविनाशी आत्... Read more

गीता के स्वर (1) कशमकश

मधुसूदन ! जनार्दन !! कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने सगों, कुटुम्बों को काल के गाल में भेजकर सुख कैसा ? राजसत्ता कैसी ? गाण्डी... Read more

मैं फिर आऊंगा

मेरे प्यारे निष्ठुर शहर ! मैं फिर आऊंगा तेरे पास उदास मत हो भले तूने आश्रय नहीं दिया मेरी मज़बूरी को न समझा न तरस खाई तो क... Read more

मुझे मेरे गाँव पहुंचा देना

हे, सर्पिली रेल की पटरियों मैं चल पड़ा हूँ त्रस्त नंगे पांव तेरे साथ आशा है पहुंचा दोगी सकुशल मेरे गाँव. चलते-चलते थक जाऊं ... Read more

श्रमिक

श्रमिक मिल जायेंगे शहरों की तंग गलियों में बजबजाती नालियों के किनारे झुग्गियों में चीथड़ों में लिपटे और मिल जायेंगे शहर की... Read more

रोटी

आज जब पूछा- एक कामगार से 'रोटी' की व्यवस्था है न मै हूँ चिंता मत करना. अभी तो है, आगे भगवान मालिक आपने पूछा समझो रोटी मिल... Read more

मैं ही मैं

कोरोना ने ‘मैं’ को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है. ‘मैं’ ही कारक ‘मैं’ ही हन्ता और ‘मैं’ ही नियंता को स्थापित कर दिया है ने... Read more

मील का पत्थर

समय व नियति का दौर कुछ ऐसा चल रहा है, यथार्थ- पागल करार दिया गया है फिर भी, संसार ऐसे ही पागलों की अनचाही कब्रों पर अपन... Read more

मुकुट उतरेगा

सुन भाई, मैं सन दो हजार उन्नीस का, आक्रान्ता सम्राट हूँ मैं एक रहस्यमयी मुकुट हूँ. एक यायावर हूँ सबको मुकुट पहनाने की चाह ल... Read more

आओ दीप जलाएं

‘आओ हम सब मिल एक दीप जलाएं’ आलोकित हो घर-आंगन झूम उठे सबका पुलकित हो मन ऊपर नभ मुस्काए आओ हम सब मिल एक दीप जलाएं. मधुर स... Read more

सन्नाटा

‘सन्नाटे’ का जीवंत दर्शन सदियों बाद या शायद पहली बार मानव ने किया है- साक्षात्. ‘सन्नाटे’ को निकट से देखकर समझ में आ गया ह... Read more

महामारी

‘महामारी’ प्रचण्ड होने पर मारती है सबसे पहले धीरे-धीरे मानवता को, कोरोना के कहर ने सिद्ध कर दिया है एक प्रमेय की तरह.... Read more

जुम्मे की नमाज़

‘सुरक्षा’ व ‘शांतिपूर्ण’ माहौल में सम्पन्न हुई जुम्मे की नमाज़ सुर्खिया बनने लगी हैं, चौथे स्तम्भ की कहते है यह रहम का दिन है ... Read more

डर

क्यों डरने लगा हूँ, लिखने से हिचकने लगा हूँ, बोलने से सत्य के प्रकटन से, क्या डर है कोई सगा दूर होने लगेगा लिखने से, कुछ बो... Read more

फ़ैसला

कौन कहता है, इंसान भगवान नहीं होता. बस, बनना पड़ता है गढ़ना पड़ता है स्वयं को- यह हौंसले की बात है. क्या यह सत्य नहीं ? कुछ इंस... Read more

रिश्ते

रिश्ते मरने लगते हैं, धीरे -धीरे जब अनकही कथनों को कहा माने जाने लगता है। नदी के निर्मल प्रवाह में जब- कैक्टस उगने लगता है औ... Read more

शब्दों को गुनगुनाने दें

शब्द गुनगुनाते और रोते भी हैं, इन्हें सिसकते भी देखा गया है। गुनगुनाते हैं यह, देवालयों की पवित्र सीढ़ियों पर । मंद-मंद मुस्कुर... Read more

नेता की पीड़ा

नेता, ब्रह्मांड का सबसे रहस्यमयी प्रकटन कोई नहीं समझता उसकी पीड़ा उसकी आंखें नम नहीं होतीं वह रो नहीं पाता, रुलाता है। उसने न ... Read more

माँ

किसमें सामर्थ्य है 'माँ' को परिभाषित/ परिमापित करने का, सम्पूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममत्व और प्रेम और क्या नहीं निहित है 'माँ'... Read more

आस्था की आरसी

संसार की तथाकथित नियमावली मुझे अभिशप्त कर रही है. और तुम बैठे, मेरी बेबसी पर मुस्करा रहे हो यह मेरी सामाजिक संत्रास ही नहीं, हृ... Read more

वेदना

'वेदना' कष्ट का पर्याय नहीं अपितु 'शक्ति' का स्रोत है। एक अलौकिक शक्ति, जो बनाती है, मानव को दृष्टा, 'प्रसव-वेदना' को ही लें ... Read more

मीडिया

मीडिया अब, धीरे-धीरे मर रही है। बिना संकोच बेहयाई से, मीडिया अब, गोंद में बैठने लगी है उनके जो पवित्र लोकतंत्र के अस्तित्व को... Read more

किसान

रूको, देखो वह अंधेरे को चिरता कौन आ रहा है? देखो , खेतों के मेड़ पर खड़ा वह शून्य आँखों से निहारता चुपके से, खड़ी फसल को सहलाया ... Read more

नेता

सावधान! मैं नेता हूँ जनता का प्रतिनिधि जो बढ़ाता है, बहुविधि अपनी निधि। मेरी हर गतिविधि होती है अत्यन्त रहस्यमयी मैं फेंकता हू... Read more

शब्द

शब्द जीवन्त होते हैं और कालजयी भी पर यह क्या हो गया है शब्दों की संस्कृति मर रही है शब्द अब घबड़ाने लगे है प्रयोग की मार्मिक व... Read more

मोक्ष

मोक्ष.. 'मानव की अंतिम इक्छा का, एक अबुझ पहेली, क्या 'जीवन' के कर्मों से मुक्त होना है मोक्ष या इस नश्वर शरीर को त्यागना है मोक्... Read more

गधी का दूध

गधों को गदहा कहने पर लोग मुस्करा देते हैं. ऐसे सीधे-साधे प्राणी को लोग सरस्वतीविहीन मानते हैं. यदि किसी विवेकशील मनुष्य पर सरस्वती क... Read more

गदहे

गदहे, अब मुख़्यधारा में आ रहे हैं. वे रेंकने के बजाय, फेंकने लगे हैँ. गदहों का भोलापन, उनके लदे होने का यथार्थ, अब राजनीति का ... Read more

समय

समय धन है, और संसार का मूल्यवान भी 'धन' समय को नहीं खरीद सकता पर 'समय'- धन का सृजन कर सकता है. धन की नियति है वह लौट सकता है ... Read more

नोटबंदी साठा-1

(1) नव विहान होने लगा है, पंक्तियाँ सिमटने लगी हैं, देश शीघ्र ही कैशलेस हो जायेगा, देश अचानक शिक्षित हो जायेगा, कुदाल फावड़े पकड़... Read more

हनुमान कूद

दुश्मन को देखकर भागने से पहले हिरण एक लम्बी छलांग क्यों लगाती है ? इसलिए, हाँ शायद इसलिए, दुश्मन को आभास हो जाय शावक ने उसे दे... Read more

आतंकवाद

आतंकवाद, उफ़! धागों की तरह उलझ गए हैं लोग हिंसा के अभिनन्दन में नहीं...नहीं...नहीं शायद इसलिए कि महान समीप्यपूर्ण एकता को छो... Read more

आज बहुत ठंडक है

आज जब मैं अपने गांव से गुजर रहा था एक कंकाल नंगे शरीर कानों पर गुदड़ी का मफलर बांधे दोनों हाथों को विपरीत काँखों में दब... Read more

आदमी

मंजिलों की चाह में कफ़िलों के साथ हर पता पर रहगुजर से पूछता है आदमी. ...... आदमी जब आदमी को लुटने लगा आदमी के नाम पर अब ... Read more