suresh chand

Joined August 2016

जन्म -12 जुलाई 1972 को ग्राम व पो. जंगल चवँरी, थाना खोराबार, जिला-गोरखपुर (उ.प्र.) में । शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी) तथा एल.एल.बी.। बाँसुरी एवं तबला से संगीत प्रभाकर। प्रथम काव्य संग्रह ‘हम उन्हें अच्छे नहीं लगते’ वर्ष 2010 में प्रकाशित। संप्रतिः भारतीय जीवन बीमा निगम, शाखा सी.ए.बी., बक्शीपुर, गोरखपुर में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत।
email: suresh.kavi.lic@gmail.com ; मोबाइल +919451519473

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हम उन्हें अच्छे नहीं लगते (कविता)

इस शस्य श्यामला भारत भूमि की हर चीज उन्हें अच्छी लगती है नदी, झरने, ताल-तलैया, सब कुछ.... पीले-पीले सरसों हों या बौर से लद... Read more

गरीब का दुःख (कविता)

गरीब के श्रम से बनी है दुनिया और उनके दुःख से चलती है देश की अर्थव्यवस्था जहाँ बिकती है हर चीज मुनाफा के लिए स्त्री का तन... Read more

बेटी- तीन कवितायें

(एक) बेटी सबसे कीमती होती है अपने माँ-बाप के लिए जब तक वह घर में होती है उसकी खिलखिलाहट पूरे घर को सँवारती रहती हैं ... Read more

हिन्दी जन की बोली है (गीत)

हिन्दी जन की बोली है हम सब की हमजोली है खेत और खलिहान की बातें अपने घर संसार की बातें उत्तर-दक्षिण फर्क मिटाती करती केवल... Read more

ओ काली घटा (गीत)

ओ काली घटा मेरे आँगन आ तू मेरी सहेली बन जा रे ! है सूखी धरती, प्यासी धरती धरती सूख कर हो गयी परती इस परती में रिमझिम-रिमझ... Read more

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से (गीत )

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से। धूल भरी पगडण्डी पीपल की छाँव से। शब्दों में इसकी थोड़ी ठिठोली है भौजी ननदिया की यह हमजोली है ... Read more