सुनील कुमार सजल

बम्हनी बंजर ,मंडला म.प्र.

Joined March 2018

लघुकथा , हायकू , व्यंग्य में लेखन

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हायकू

चाँद छिपा था तुम्हे देख के नहीं बादलों में था । * गोरा रूप है या पारे का लेपन तेरा चेहरा । * बेरोजगारी ... Read more

हायकू

चाँद छिपा था तुम्हे देख के नहीं बादलों में था । * गोरा रूप है या पारे का लेपन तेरा चेहरा । * बेरोजगारी ... Read more

हायकू

1 गाँव का गांव डूब गया बाढ़ में गिध्दों का जश्न । 2 सावन आंखें दलदली जीवन धंसते पाँव । 3 वक्त के साथ होते रहे धूमिल रि... Read more

हायकू

1 धूप हवाएं तेज थी पर सूखी न भींगी आँखे । 2 अपना गाँव तुम्हारी जुल्फों की सी मधुर छाँव । ... Read more