Sandeep Vyas

Rajasthan

Joined November 2017

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माँ

कितनी गहराई है तेरे मन की माँ रोज़ उतरता हूँ गोते लगता हूँ इस प्यार के सैलाब में एक ख़ुशनुमा नदी बहती है तेरे मन में एक ऊँचा... Read more

भीड़

कहा सोचती है यह भीड़ कुचलती हुई आगेबढ़ती है ये भीड़, घमंड से सरोबार, बस मारती है ये वैशी भीड़, रौंदती है बूढ़ी माँ की लाठी को ... Read more

परछाईं और सूर्य

यह जो परछाईं है मेरी, कभी मेरे आगे, कभी मेरे पीछे, और कभी एकाकार। यह कुछ रिश्ते भी है मेरे, कभी खटास, कभी मिठास, और कभी एक ... Read more

समय

समय से कुछ माँगा मैंने कुछ चाह थी, परवाह थी, पर असमय ही दिया तूने, कुछ रिश्ते माँगे, सिर्फ़ एहसास दिया तूने, कुछ चीज़ें माँगी,... Read more

एक और एकान्त

एक से बना मे एक में ही बढ़ा में एक एक और मिले , रिश्तों के ताने बुने, फिर भी, खोजता उस एक को रहा में अन्त में एकान्त है बस एक... Read more

क्यारी

न मेरी, न तुम्हारी, ये है हम सब की क्यारी, उन गढ़ते रिश्तों की, गहराती यादों की, परत दर परत जमती कहानियों की, याद दिलाती सब क... Read more

चादर

अनेक कहानियाँ सिमट जाती हैं उन तह की गयी चादरों में उन्हें बिखरी रहने दो.... हर सलवट में है नई कहानी, बचपन में भाई से लड़ाई की... Read more

पगडँडी और सड़क

जीवन को नापती, ये पतली गलियाँ अब चौड़ी और मगरूर हो गई है, गाँव की वो पगडँडी, जो अकसर घर पर आकर, रूक जाया करती थी, आज शहर की ... Read more

पुरानी जेब

पुराने कोट की पुरानी जेब में , टटोला तो कुछ टुकड़े मिले, कॉंच के, हर टुकडे में कुछ निंशा थे, बीते कल के,कुछ पल के, नन्ही लोरी क... Read more