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ग़ज़ल

वज़्न : 221 1221 1221 122 हर सम्त अंधेरा है इसे दूर भगाओ है कोई मुनव्वर तो मिरे सामने आओ क़ातिल हो तो क़ातिल की तरह पेश भी आओ ... Read more