परिचय : कवि रमेशराज
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पूरा नाम-रमेशचन्द्र गुप्त, पिता- लोककवि रामचरन गुप्त, जन्म-15 मार्च 1954, गांव-एसी, जनपद-अलीगढ़,शिक्षा-एम.ए. हिन्दी, एम.ए. भूगोल
सम्पादन-तेवरीपक्ष [त्रैमा. ]सम्पादित कृतियां1.अभी जुबां कटी नहीं [ तेवरी-संग्रह ] 2. कबीर जि़न्दा है [ तेवरी-संग्रह]3. इतिहास घायल है [ तेवरी-संग्रह
एवम् 20 स्वरचित कृतियाँ | सम्पर्क-9634551630

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तेवरी में गीतात्मकता

योगेन्द्र शर्मा ग़ज़ल के जन्म के समय, लगभग सभी प्रचलित विधाएं, कथ्य पर ही आधारित थीं। ग़ज़ल का कथ्य था, हिरन जैसे नेत्रों वाल... Read more

तेवरी को विवादास्पद बनाने की मुहिम +रमेशराज

ग़ज़ल-फोबिया के शिकार कुछ अतिज्ञानी हिन्दी के ग़ज़लकार तेवरी को लम्बे समय से ग़ज़ल की नकल सिद्ध करने में जी-जान से जुटे हैं। तेवरी ग़ज़ल... Read more

‘घड़ा पाप का भर रहा’ एक विलक्षण तेवर-शतक

कविता में ‘तेवरी प्रयोग’ साहित्य के लिए एक सुखद अनुभव *विश्वप्रताप भारती ---------------------------------------------------------... Read more

तेवरी के तेवर को दर्शाती पत्रिका ‘तेवरीपक्ष’

[ ग़ज़ल और तेवरी का विवाद बेकार की कवायद ] -भगवानदास जोपट हिन्दी कविता के क्षेत्र में कविता की अनेक विधाओं के मध्य तेवरी विधा का... Read more

तेवरीकार रमेशराज, राजर्षि जनक की भूमिका में *योगेन्द्र शर्मा

कविवर निराला का कथन है-“कविता बहुजीवन की छवि है।“ तेवरी भी माँ सीता की तरह, भूमि से ही जन्मी है, और रमेशराज, राजर्षि जनक की भूमिका म... Read more

ग़ज़ल एक प्रणय गीत +रमेशराज

ग़ज़ल का अतीत एक प्रणय-गीत, महबूबा से प्रेमपूर्ण बातचीत’ के रूप में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए साहित्य-संसार में सबके सम्मुख आया। ज... Read more

|नये शिल्प में रमेशराज की तेवरी

हम चोर लुटेरों ने घेरे हर सू है चीख-पुकार | इस बार || हम घने अंधेरों ने घेरे दिखती न रौशनी यार | इस बार || हम सेठ-कुबेरों ... Read more

नये शिल्प में रमेशराज की तेवरी

कोई तो किस्सा पावन हो, वृन्दावन हो अब चैन मिले मन को कुछ तो | तहखानों बीच न जीवन हो, घर-आँगन हो सुख के पायें साधन कुछ तो | ... Read more

रमेशराज की एक तेवरी

दारू से कुल्ला बम भोले अब खुल्लमखुल्ला बम भोले | ईमान बेचकर इस युग में खुश पण्डित-मुल्ला बम भोले | हर रोज सियासत मार रही ... Read more

तीन मुक्तकों से संरचित रमेशराज की एक तेवरी

जनता पर वार उसी के हैं चैनल-अख़बार उसी के हैं | इसलिए उधर ही रंगत है सारे त्योहार उसी के हैं | सब अत्याचार उसी के हैं अब था... Read more

मुक्तक-विन्यास में रमेशराज की तेवरी

पीयें ठर्रा-रम बम भोले हम सबसे उत्तम बम भोले | जनता से नाता तोड़ लिखें सत्ता के कॉलम बम भोले | + हम पै कट्टे-बम बम भोले हम यम... Read more

मुक्तक-विन्यास में एक तेवरी

मैं तो हूँ पावन बोल रहा अब पापी का मन बोल रहा | नित नारी को सम्मान मिले हँसकर दुर्योधन बोल रहा | सूखा को सावन बोल रहा अंध... Read more

रमेशराज के विरोधरस के दोहे

क्रन्दन चीख-पुकार पर दूर-दूर तक मौन आज जटायू कह रहा ‘सीता मेरी कौन‘? +रमेशराज बल पा ख़ूनी शेर का शेर बनें खरगोश यही शेर ठंडा... Read more

रमेशराज के प्रेमपरक दोहे

तुमसे अभिधा व्यंजना तुम रति-लक्षण-सार हर उपमान प्रतीक में प्रिये तुम्हारा प्यार | +रमेशराज +मंद-मंद मुसकान में सहमति का अनुप्र... Read more

तेवरी

हिंसा से भरा हुआ नारा अब बोले धर्म बचाना है हर ओर धधकता अंगारा अब बोले धर्म बचाना है | जो कभी सहारा नहीं बना अपने बूढ़े माँ-बापों ... Read more

तेवरी

जिनको देना जल कहाँ गये सत्ता के बादल कहाँ गये ? कड़वापन कौन परोस गया मीठे-मीठे फल कहाँ गये ? जनता थामे प्रश्नावलियां सब सरकार... Read more

तेवरी

गुलशन पै बहस नहीं करता मधुवन पै बहस नहीं करता जो भी मरुथल में अब बदला सावन पै बहस नहीं करता | कहते हैं इसे न्यूज़-चैनल ये जन... Read more

रमेशराज के 2 मुक्तक

गुलशन पै बहस नहीं करता मधुवन पै बहस नहीं करता वो लिए सियासी दुर्गंधें चन्दन पै बहस नहीं करता | +रमेशराज ------------------... Read more

रमेशराज के दो मुक्तक

जटा रखाकर आया है, नवतिलक लगाकर आया है मालाएं-पीले वस्त्र पहन, तन भस्म सजाकर आया है जग के बीच जटायू सुन फिर से होगा भारी क्रन्दन ... Read more

रमेशराज के 2 मुक्तक

1. हम शीश झुकाना भूल गये सम्मान जताना भूल गये, तेज़ाब डालते नारी पर अब प्यार निभाना भूल गये | +रमेशराज ====================... Read more

|| तेवरी ||

सूखा का कोई हल देगा मत सोचो बादल जल देगा | जो बृक्ष सियासत ने रोपा ये नहीं किसी को फल देगा | बस यही सोचते अब रहिए वो सबको राह... Read more

तेवरी

उसकी बातों में जाल नये होने हैं खड़े बवाल नये | बागों को उसकी नज़र लगी अब फूल न देगी डाल नये | छलना है उसको और अभी लेकर पूजा क... Read more

तेवरी

खुशियों के मंजर छीनेगा रोजी-रोटी-घर छीनेगा | है लालच का ये दौर नया पंछी तक के पर छीनेगा | हम जीयें सिर्फ सवालों में इस खातिर ... Read more

रमेशराज के 2 मुक्तक

बस यही फैसला अच्छा है मद-मर्दन खल का अच्छा है | जो इज्जत लूटे नारी की फांसी पर लटका अच्छा है || +रमेशराज -----------------... Read more

माया फील गुड की [ व्यंग्य ]

‘फील गुड’ मुहावरे का इतिहास बहुत पुराना है। आदि देव शिव ने अनेक राक्षसों को इसका अनुभव कराया। भस्मासुर ने तो शिव से वरदान प्राप्तकर ... Read more

चचा बैठे ट्रेन में [ व्यंग्य ]

वैसे मैं न तो बीमा ऐजेन्ट हूँ और न किसी बीमा कम्पनी वाले का रिश्तेदार | फिर भी अपनी सफेद दाड़ी और नकली दांतों के अनुभव के आधार पर इ... Read more

दास्ताने-कुर्ता पैजामा [ व्यंग्य ]

काफी दिनों से खादी का कुर्ता-पजामा बनवाने की प्रबल इच्छा हो रही है। इसके कुछ विशेष कारण भी है, एक तो भारतीय-बोध से जुड़ना चाहता हूं,... Read more

साक्षात्कार एक स्वास्थ्य मंत्री से [ व्यंग्य ]

आज हम आपको जिस स्वास्थ्य मंत्री से साक्षात्कार करा रहे हैं, इनका स्वास्थ्य पिछले वर्षों में महाजन के सूद की तरह दिन दूना और रात चौगु... Read more

व्यंग्य

पुलिस बनाम लोकतंत्र +रमेशराज -------------------------------------------------- लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका को नकारा नहीं जा सकत... Read more

कहानी

अजगर +रमेशराज --------------------------------------------------- आप जि़द कर रहे हैं तो सुना ही देता हूं कि मुझे इन दिनों एक रोग... Read more

कहानी

वक़्त एक चाबुक है +रमेशराज ------------------------------------------- पारबती है ही कुछ ऐसी, भूख से लड़ती है, भूख और बढ़ती है। गर... Read more

रमेशराज के 2 मुक्तक

मिलता नहीं पेट-भर भोजन अब आधी आबादी को नयी गुलामी जकड़ रही है जन-जन की आज़ादी को | भारत की जनता की चीख़ें इन्हें सुनायी कम देतीं ह... Read more

तेवरी

मैं भी अगर भाट बन जाता गुण्डों को सेवक बतलाता | कोयल के बदले कौवों को सच्चा स्वर-सम्राट सुझाता | सारे के सारे खलनायक मेरे हो... Read more

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरियाँ

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी....1. ----------------------------------------------- कैसे भये डिजीटल ऊधौ पहले थे हम सोने जै... Read more

किसानों की दुर्दशा पर एक तेवरी-

सरकारी कारण लुटौ खूब कृषक कौ धान रह गयौ बिना रुपैया, धान कौ हाय बुवैया | दरवाजे पे कृषक के ठाडौ साहूकार ब्याज के बदले भैया, खोल... Read more

लोकशैली में तेवरी

नारे थे यहाँ स्वदेशी के हम बने विदेशी माल , सुन लाल ! अपने हैं ढोल नगाड़े पर ये मढ़े चीन की खाल , सुन लाल ! हम गदगद अपने बागों म... Read more

वर्णिक छंद में तेवरी

गण- [राजभा राजभा राजभा राजभा ] छंद से मिलती जुलती बहर –फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन .................................................. Read more

लोकशैली में तेवरी

सडकों पै मारपिटाई करते बर्बर आतताई होते सरेआम उत्पात दरोगा ठाड़ो देखै | हाथों में छुरी तमंचे जन को लूट रहे नित गुंडे गोदें चाह... Read more

रमेशराज की एक हज़ल

बोलै मति हमकूँ ठलुआ, हमतौ चाकी के गलुआ, जै राधे की। प्रेम-बाँसुरी बजा रहे हम हमकूँ कहियो मत कलुआ, जै राधे की। बूँद-बूँद यू... Read more

रमेशराज की तेवरी

जनता की थाली बम भोले अब खाली-खाली बम भोले | श्रम जिसके खून-पसीने में उसको ही गाली बम भोले | इस युग के सब गाँधीवादी कर लिए दु... Read more

रमेशराज के कुण्डलिया छंद

कुंडलिया छंद ------------------------------------------- जनता युग-युग से रही भारत माँ का रूप इसके हिस्से में मगर भूख गरीबी धूप... Read more

रमेशराज की पेड़ विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। नदी है कितनी महान।। नदी सींचती है / खेत जलती हुई रेत नदी बूंद-बूंद रिसती है पेड़ पौधों की जड़ों में नदी गुजरती... Read more

रमेशराज की पत्नी विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। मेरे बारे में ।। पत्नी जानती है जानती है पत्नी यही कि- इस अभाव-भरे माहौल में मैंने बहुत चीजों में कटौती कर दी... Read more

रमेशराज की ‘ गोदान ‘ के पात्रों विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद-।। सच मानो होरीराम।। ------------------------------------------------- युग-युग से पीड़ित और शोषित होरीराम वक्त बहुत बदल ... Read more

रमेशराज की विरोधरस की मुक्तछंद कविताएँ—1.

-मुक्तछंद- || सुविधा-विष || कैसी बिडम्बना है कि हम सभी अक्सर व्यवस्था की आदमखोर तोंद पर मुक्का मारने से पहले उन सारी तनी हुई ... Read more

रमेशराज की विरोधरस की मुक्तछंद कविताएँ—2.

-मुक्तछंद- ।। एक शब्द ।। आज यह होना ही चाहिए कि हम सब धीरे-धीरे भूख से विलखते हुए धुआ-धुआ होते हुए लोगों के बीच एक शब्द टटोलें ... Read more

रमेशराज की माँ विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। बच्चा मांगता है रोटी।। बच्चा मांगता है रोटी मां चूमती है गाल | गाल चूमना रोटी नही हो सकता, बच्चा मागता है रोटी।... Read more

रमेशराज की बच्चा विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। जूता और बच्चा ।। जूते को लगातार चमकाता है उसे आईना बनाता है रंग और क्रीम के साथ जूते पर पालिश करता हुआ बच्चा... Read more

रमेशराज की पिता विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। ओ पिता ।। मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ ओ पिता ओ पिता मैं तुमसे पूछना चाहता हूं मेरे इन निष्कंलक हाथों में अहिंसा का ... Read more

रमेशराज की चिड़िया विषयक मुक्तछंद कविताएँ

-मुक्तछंद- ।। बहरहाल ।। चिडि़या अब साफ पहचानने लगी है कि हर पेड़ के पीछे चिड़ीमार बहेलिया है बन्दूक या गुलेल के साथ। चिडि़य... Read more