I am Rajeev ‘Prakhar’ active in the field of Kavita.

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सुन्दर स्वप्न सजाओ बच्चो

सुन्दर स्वप्न सजाओ बच्चो, छुट्टी में इस बार। पुस्तक बन कर तुम्हें पुकारें, प्रेरक गाथायें। आने वाले कल की बन कर, उजली आशाये... Read more

सुन्दर स्वप्न सजाओ बच्चो

सुन्दर स्वप्न सजाओ बच्चो, छुट्टी में इस बार। पुस्तक बन कर तुम्हें पुकारें, प्रेरक गाथायें। आने वाले कल की बन कर, उजली आशाये... Read more

देख चुनावी होली प्यारे

देख चुनावी होली प्यारे, जोर-शोर से जारी। किस-किस ने किस-किस के जाने, कैसा रंग लगाया। खड़ा हुआ दर्पण के आगे, कुछ भी समझ न आ... Read more

वादों का घोड़ा

लो जी सरपट लगा दौड़ने, फिर वादों का घोड़ा। कोठी हो या झोंपड़पट्टी, सबको शीष नवाता। पीठ चढ़ाकर बड़े प्रेम से, स्वप्नलोक पहु... Read more

आओ टेसू

आओ टेसू, होली फिर से, तुम्हें बुलाती है। रंग-बिरंगा गरल हवा में, श्वास-श्वास मटमैली। चीर गँवाया मर्यादा ने, भाषा हुई विषैल... Read more

बाल-कविता :

आओ चिड़िया रानी ------------------------- बड़े प्रेम से रखा हुआ है, छत पर दाना-पानी। उड़ती-उड़ती, चीं-चीं करती, आओ चिड़िया रा... Read more

चतुष्पदी

(१) पापा ------- दुनिया के हर सुख से बढ़कर, मुझको प्यारे तुम पापा। मन के नभ में सूरज, चंदा और सितारे तुम पापा । ओढ़ तिरंगा वापस... Read more

कृति-समीक्षा : 'किसको कहूँ पराया मैं'

सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति देती कृति - 'किसको कहूँ पराया मैं' ---------------------------- रचनाकार - वीरेन्द्र सिंह 'ब्रजवासी... Read more

कृति-समीक्षा - 'स्पंदन'

वर्तमान सामाजिक परिवेश को साकार करती कृति - 'स्पंदन' रचनाकार : अशोक विश्नोई समीक्षक : राजीव 'प्रखर' सामाजिक सरोकारों एवं समस्... Read more

कुछ दोहे

बढ़ते पंछी को हुआ, जब पंखों का भान। सम्बंधों के देखिए, बदल गए प्रतिमान। देखी नटखट भ्रमर की, जब कलियों से प्रीत। चुपके-चुपके ल... Read more

शरारत-नामा

देख देख कर बच्चा पलटन, करती सा-रे-गा-मा। रजनी नानी की गोदी में, बैठे चंदा मामा। नीचे आ जाने को सारा, घर आवाज़ लगाता। लेकिन... Read more

कुछ पल का बचपन

जीवन की इस भागदौड़ से, कुछ पल को बचपन में जायें। मेरे प्यारे बड़े साथियो, आओ मिलकर शोर मचायें। जीवन की इस भागदौड़ से...। चा... Read more

कृति-समीक्षा

संघर्षों को ध्वनि देता कहानी-संग्रह : 'दहकते गुलमोहर' ----------------------- समीक्षक : राजीव 'प्रखर', मुरादाबाद (उ. प्र.) कह... Read more

पुस्तक समीक्षा - 'नाद और झंकार'

कृति-समीक्षा ----------------- प्रकृति से एकाकार करती कृति - 'नाद और झंकार' --------------------- कवयित्री - श्रीमती आदर्शिनी... Read more

देवी

देकर नारी-शक्ति का नारा, ये क्या ढोंग रचाते हैं l देवी से नफ़रत करके, देवी को शीष नवाते हैं l देकर नारी-शक्ति का नारा .. कहीं... Read more

कुछ दोहे

घोर तमस संसार में, भटक रहा इन्सान l सबके अपने देखिये, अलग-अलग भगवान l --------------- नई पौध के दौर में, मर्यादा यों ढेर l रा... Read more

भाई दूज

लेकर थाली खड़ी अकेली, मुझको गीत सुना जा ना l भाई-बहिन का प्यार अनोखा, फिर जग को बतला जा ना l सात समुन्दर पार से भाई, जब न घर ... Read more

फिर आओ गिरधारी

घोर तमस छाया है देखो, पाप-ताप लाचारी का l चहुँ ओर है झंडा ऊँचा, लोभी-अत्याचारी का l आहत है जग, मानवता का, एक नया युग लाने को ... Read more

बन्दरबांट

मित्रो, प्रस्तुत है मेरी एक पुरानी व्यंग्य रचना, शीर्षक है - 'बन्दरबांट l यह रचना कुछ वर्ष पूर्व 'अमर उजाला' में मेरे वास्तविक नाम (... Read more

कुछ लघु रचनाएं

अब दुनियां में सम्बन्धों की, इक पहचान लिफ़ाफ़ा है l हर रिश्ते में. हर नाते में, बसती जान लिफ़ाफ़ा है l चाहे बजती शहनाई हो, या म... Read more

गंगा-स्नान

गंगा-तट पर जाकर भी ना, है पापों का भान l कौन कराएगा प्यारे, गंगा को स्नान l गंगा तट पर जाकर भी...l करके पावन जल को मैला, डु... Read more

साक्षात्कार

झूठ बोल सकते हो ? नहीं साहब l चोरों लुटेरों की मदद कर सकते हो ? नहीं साहब l किसी निर्दोष और लाचार को सता सकते हो ? नहीं साह... Read more

ममता

ममता देकर पीड़ा हरती, जब-जब संकट आते हैं l मानव ही क्या,पशु-पक्षी भी, माँ की महिमा गाते हैं l ममता देकर पीड़ा हरती...l बच्चों... Read more

प्रश्नचिन्ह (?)

गरीबी से त्रस्त और बेरोज़गारी से ग्रस्त, एक पढ़े-लिखे का दुर्भाग्य, अपनी जगह से कुछ हिला, जब प्रगति के नाम पर, 'घूस प्रशिक्षण के... Read more

मगरमच्छ

मोटे-ताजे-रसीले व्यंजनों के शौकीन, एक मगरमच्छ का दिल, एक नेताजी पर, मचल गया था l नेताजी का स्वास्थ्य, उसे रास आ़या, इसलिये वह ... Read more

विकास

विकास का प्रतीक इक शहर, गन्दगी में फँसा, रो रहा था l क्योंकि, कई वर्षों से वहाँ, किसी मन्त्री का दौरा, नहीं हो रहा था l आखिरका... Read more

कान्हा-व्यथा

कान्हा बोले यूँ मैया से, "क्यूँ कलियुग में जाऊँ मैं l जो माखन अब नहीं है असली, काहे भोग लगाऊँ मैं"? कान्हा बोले यूँ मैया से ...l... Read more

साया

हरे-भरे इक पेड़ से मिलती, हमको शीतल छाया है l लगता ऐसा, सर पर अपने, बाबूजी का साया है l हरे-भरे इक पेड़ से मिलती ...l भोर भयो... Read more

हरियाली

बहिना बोली यूँ भैया से, ना झुमका, ना लाली ला l लाना ही चाहे तो केवल, ढेरों सी हरियाली ला l बहिना बोली ... l अब चीं-चीं करते वो ... Read more

जंग

जात-पात और भेदभाव से अब लड़ने की बारी है, उठो साथियो, आज़ादी की जंग अभी भी जारी है l जिस आज़ादी की खातिर, वीरों ने फंदे चूमे थे,... Read more

विष

राधा रानी कब तारेंगी, फिर वृक्षों की छांवों को l गोकुल-मथुरा-वृंदावन औ, बरसाने से गांवों को l विष से आहत माता जमुना, कातर होकर पूछ... Read more