एक नवागत काव्यकार, जो वरिष्ठ रचनाकारों की संगति में सीखने का इच्छुक है।

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मातृ दिवस पर दो रचनाएँ

मातृशक्ति को नमन दो रचनाएँ.... कुंडली... माता की ममता बड़ी, संतति को दे प्यार। उत्तम करती पालना, भर देती संस्कार। भर देती संस... Read more

महिला

?? *अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर मातृशक्ति को नमन करते हुए एक रचना प्रस्तुत करता हूं.* ?? *जिस कोख से सबने जन्म लिया, मैं उसकी बात... Read more

बसंत का पुनरागमन

बसंत पर मन के कुछ भाव???? ""खिलें पुष्प हैं गुलशन- गुलशन, महकें मंजरीं उपवन-उपवन. फागुन की मदमस्त बयार , झूम उठाए सबके तनमन.... Read more

चुनाव

*एक गीतिका....* *शीर्षक  -  चुनाव* *चुनावों के बहाने से हमें नेता लुभाते हैं।* *दिखा मीठे सपन सबको गरीबो को पटाते हैं।1* *... Read more

संयुत

*संयुत छंद में कुछ मुक्तक* *विधान-* [सगण जगण जगण गुरु ] (112 121 121 2) 4 चरण, 1,2,4 चरण समतुकांत तथा तीसरा चरण अतुकांत।... Read more

एक खुद पसंद ग़ज़ल

एक खुद पसंद ग़ज़ल... काफ़िया "अर" का स्वर रदीफ़ देखते रहे बह्र 221 2121 1221 212 वो जिस पे' आएं'गे वो' डगर देखते रहे... Read more

कृष्ण की मुरली पर एक मुक्तक

कृष्ण की मुरली पर एक मुक्तक.. अरे कान्हा तेरी मुरली हमें हरदम लुभाती है। ते'री बंसरी की' धुन कानो में' रस सा घोल जाती है। अधर स... Read more

कृष्ण पर एक कुंडलिनी

कृष्ण पर एक कुंडलिनी... हे कृष्णा मुरली तेरी, मन को रही लुभाय। होंठो के स्पर्श को, सबका जी ललचाय। सबका जी ललचाय, मिटेगी कैसे ... Read more

विधाता छंद पर आधारित एक गीतिका

किनारे इक समंदर के निशा के ज्वार को देखा। पटकती सर किनारे पर लहर के प्यार को देखा।1 ज़माने में जिधर देखो वहीं शक्लें बदलती हैं। ... Read more

तीन मुक्तक

तीन मुक्तक.... इंसान जगा इक आज नया जागा सपना जब टूट गया। थी नींद बड़ी गहरी उसकी। सोया बिन पीकर वो विजया।1 जी लो तुम आज नया ... Read more

धुंध अंधाधुंध....

पर्यावरण की दुर्दशा पर कुछ विचार... क्या दिल्ली लखनऊ क्या, सबका है यह हाल। खुद ही गलती वह करे, खुद ही है बेहाल।1 गैस चैंबर मे... Read more

पंच दोहे

पंच दोहे.... पनप रहा है देश में, बहु आयामी आतंक। नहीं अछूता अब बचा, राजा हो या रंक।1 राग द्वेष भ्रष्टाचार अरु, जाति धर्म का म... Read more

आल्ह छंद में एक रचना

आल्ह छंद पर आधारित एक रचना.... (मापनी 31 तथा 16,15 पर यति, अंत में गाल) सागर जिसके पैर पखारे, खड़ा हिमालय जिसके भाल। ऐसे भारतवर्... Read more

दोहा छंदाधारित मुक्तक

*70वें स्वाधीनता दिवस पर दोहा मुक्तक शैली में देश को समर्पित एक रचना।* ???????????????????? *माटी अपने देश की, इसमें बसती जान।* ... Read more