नीरजा मेहता 'कमलिनी'

गाज़ियाबाद (उ.प्र.)

Joined January 2017

बड़े-बड़े साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़कर लिखने की इच्छा जागृत हुई और उन्हीं की प्रेरणा से लिखना प्रारम्भ किया। कई वर्षों तक डायरी तक ही सीमित रही किन्तु धीरे-धीरे पत्र-पत्रिकाओं से मैं आगे बढ़ी और 45 साझा काव्य/कहानी/लघु कथा संग्रहों में जुड़ी। जब तीन शोध ग्रंथों के लिए लिखी गयी पुस्तकों से जुड़ी और संपादन कार्य किया तब साहित्य को नया रुख मिला। अब तक मेरे बारह एकल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, और दो विशेषांक भी मुझपर निकल चुके हैं। साहित्य, शिक्षा व सामाजिक कार्य हेतु लगभग 60 बार सम्मानित हो चुकी हूँ। सच्ची लगन, ईमानदारी और सच्चाई ही मेरा धर्म है, साहित्य सेवा ही मेरा उद्देश्य है और सादगी ही मेरा जीवन है।

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"मधुमास"

मधुर मधुर मधुमास खिला मन पुलकित उल्लास मिला। भासमान है सूर्य बिम्ब चल रहा साथ निज प्रतिबिम्ब। प्रकृति ओढ़ी है नव दुकूल मन मे... Read more

बेटियाँ--------"सुन रहे हो बाबा"

एक बेटी की बात अपने पिता से—- सुन रहे हो बाबा ! जगाये थे जब मैंने दबे अहसास लिख डाले थे, अधरों पर रुके अल्फाज़, तुमने आँखें... Read more

बेटियाँ--------"सुन रहे हो बाबा"

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