कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

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बाबाओं का भंडाफोड़ (डर रहित भक्ति की ओर)

पापाजी कथा देख रहे थे। बोले ये कथावाचक तो जबरदस्त है। टीवी स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहे नंबर पर कॉल लगाया। बोले जी कथा करवानी है कितना खर... Read more

प्रलय की चेतावनी!

बांध देना आता है मुझे समंदर तुम्हारे लिए, तुम तूफानों से डरते हो? फूंक देनी आती हैं माँसल लोथड़े में जान तुम अकालमृत्त्यु से डरते ... Read more

भूल गए !

भूल गए वो छप्पर टाट जब से हो गए सत्तर ठाट भूल गए वो प्यार की बाते पा वाट्सअप फेसबुक सौगाते! भूल गए वो माँ का आँचल साथ बैठकर ब... Read more

मुझे ना पीना मैं निःसार हूँ!

मुझे ना पीना मैं निःसार हूँ मैं काटों का कंठाहार हूँ हर अभाव हर क्षत-विक्षत का मैं चिंता का सूत्रधार हूँ मुझे ना पीना मैं निःसार... Read more

अपनों की चोट! (रोहिंग्या पर आधारित)

धराशाही हो गयी थी तुम्हारी वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा जब फ़ाको में काट दिया गया था तुम्हारी उस दरियादिली को जो शरणागति की तुम्हार... Read more

कुर्बानी!

ये कैसा त्यौहार? धर्म के नाम पर, मासूमों की गर्दनों पर वार। ये कैसा त्यौहार? जहाँ सब गलत है सही, कुर्बानी के नाम पर ख़ून क... Read more

संकट और तरबूज़

तरबूज़ से हम; संकटों के चाकुओं से लोहा लेते बार बार.. परिस्थितियों की अलग-अलग धारों से लहूलुहान होते, बार बार प्रजातीय सोच क... Read more

माँ तुम मरी नहीं .. .

तुम्हारा हाथ मुझसे क्या छूटा, मानों विधाता मुझसे रूठा बाढ़ की विकराल लहरों ने तुम्हे लील लिया माँ! मेरा खून सूखता रहा जैसे र... Read more

भगवान 'को' मानते हैं, भगवान 'की' नहीं।

अपने हिसाब से हम भगवान का चुनाव करते है। फिर वो हमारे हो जाते हैं, हमारे ही शब्दों में। हम भगवान् को अपने हृदय से लगाने की बात कहते ... Read more

ये मथुरा की धरती हैं साहब !

ये मथुरा की धरती हैं साहब! जीवित हैं यहाँ कृष्ण की कहानियाँ, जीवित हैं यहाँ राधा की निशानियाँ यशोदा की जुबानियां, माखनचोर की शैत... Read more

स्याह दीवारें !

अपनी धरती के क्षितिज से कही भी देखता हूँ, कीड़े-मकोड़े सी भागमभाग दिखती हैं संबद्धता कहीं नहीँ, सब टूटे दिखाई देते हैं कोई बाह... Read more

साम । दाम । दंड । भेद !

भाई, सांई?, कम, कसाई! स्व, क्रुद्ध, कंठ, रुद्ध! चिन्त, चम्भ, क्षीण, दम्भ! शोक, योग, दुःसह, रोग! मन, पहाड़, चीर, फाड़! ... Read more

चोटीकटवा !

अफवाहों को अगर थोड़ा दरकिनार करूँ, तो पाता हूँ की चोटी हर महिला की अब रोज़ ही काटती हैं। चोटी कटवा उस हर घर में मौजूद है ... Read more

समय लगेगा !

झुकेगा दम्भ, समय लगेगा, हटेगा बंद , समय लगेगा गिरूंगा आज, उठूंगा कल, कटेगा फंद, समय लगेगा ! हारेगा खल, समय लगेगा लताडुंगा छल,... Read more

प्रतीत्यसमुत्पाद

आज ऐसा कोई भी इंसान नहीं, जिसको कोई दुःख ना हो। हर एक को कोई ना कोई दुःख अवश्य है। आखिर दुःख का स्वरूप क्या हैं? दुःख होता क्यों है?... Read more

ना आँखों में मुझे सजाओं.. .

ना आँखों में मुझे सजाओं, मैं काजल सा ठहर जाऊंगा ना बातों में मुझे लगाओ, तुम्हारे दिल में उतर जाऊंगा आऊंगा हर जन्म, रखूँगा जारी यह... Read more

क्योंकि मरना तुम्हारी हद हैं!

आँखे फाड़ लक्ष्य को ताड़, जिद पर अड़ दुःखों से लड़, काटों पर चलना तुम्हारी ज़द हैं क्योंकि मरना तुम्हारी हद है ! सुखों को छो... Read more

'उनसे' ज्यादा भुखमरे!

मेरे देश की लोकतंत्रीय चक्की में तुम घुन से लगे हो, तुम्हारी बांछे खिल जाती हैं जब आता है तुम्हारा वेतन बढ़ोतरी का प्रस्ताव, ... Read more

लगा, गलत हूँ! ?

पता चली जो गलत लिखाई, लगा गलत हूँ तुमने हटा आरी सी चलाई, लगा गलत हूँ। पता चला की भटक गया हूँ, लगा गलत हूँ तुमने सच्ची राह दिखाई, ... Read more

"मैं जो खाऊ तुम्हे क्या!" (मांसाहार पर दो टूक /- भाग 2)

कल जब मेट्रो से जा रहा था, तीन संभ्रांत परिवार की लड़कियों को बात करते हुए सुना। एक कह रही थी, "मैंने सूअर टेस्ट किया हैं। खाने में ... Read more

तुम समझती क्यों नही माँ?

तुम्हारे एक आंसू की बूंद मेरेे दिल को चीर देती है, बढ़ा मेरी पीर देती है तुम समझती क्यों नही माँ? तुम्हारी बाते महक गयी थी तु... Read more

भैंस का दर्द! (एक गंभीर कविता)

धार्मिक अनुष्ठानों और तीक्ष्ण कानूनों से, गाय तो हो गयी हैं 'राष्ट्रमाता' पर मेरा क्या? फिरी सत्ताधीशो की नज़रे वह हो गयी भाग्य ... Read more

इंसान कबसे खाओगे? (मांसाहार पर दो टूक -भाग 1)

अपनी जीभ के स्वाद के लिए मूक और निरीह जानवरों को जो अपना निवाला बनाते हैं, मैं पूछता हूँ, इंसानों की बारी कब आ रही है? एक दर्द से कर... Read more

'विश्वास' (लघुकथा)

बस भाई ...ज्यादा नही.... "अरे यार क्या बात कर रहा हैं.. एक पैग और ..मेरा भाई हैं एक पैग और मारेगा.. ये मारा...ये मारा... हां हा हा ... Read more

छलक पड़ती हो तुम कभी.. .

छलक पड़ती हो तुम कभी , एक कशिश छोड़ जाती हो भिगाती बारिशें हैं मुझे, तुम तपिश छोड़ जाती हो अलग बहता हूँ तुमसे मैं, कभी जब बहकने लग... Read more

कन्यादान

नही कर्ण भी समता रखता नही कर्ण का दान महान, सब दानों से बढ़कर होता एक बेटी का कन्यादान! पिछले कितने सुकर्मों से, बेटी पैदा होती ... Read more

समयातीत

जीवन की वेदी पर दुखाग्नि के हवन में समय की आहुतियाँ देता रहूँगा बार-बार करता रहूँगा भस्मीभूत तुम्हारे हर एक दारुण्य को उठाऊं... Read more

और तुम कहते हो कि तुम सुखी हो !

तुम केवल बाहर से हँसते हो, दिखावटी.. अंदर से बेहद खोखले हो तुम, घुटन, असंतुष्टि, पीड़ा, अपमान, अहम्, ईर्ष्या.. इन सबको कही गहर... Read more

जीवन का उद्देश्य क्या हैं?

‌इतनेदिनों से मैं सोच रहा था, चिंतन कर रहा था, औरों को सुन रहा था, मगर अब खुद का कुछ निजी अनुभव साझा करने का समय है। अक्सर आपने सुना... Read more

वजह तुम हो तन्हाई की.. .

वजह तुम हो तन्हाई की, मेरा त्यौहार तुम ही हो, भले मैं पैर का घुँघरू, मगर झंकार तुम ही हो कभी हाथों के परदे आँख पर रख, देखती हो मुझ... Read more

मिलता नही कभी भी, जिंदगी में कुछ मुकम्मल..

मिलता नही कभी भी, जिंदगी में कुछ मुकम्मल, कभी पाते भी हो, तो बहुत कुछ गवांकर सहज नहीं हैं मेहनत का फल चुटकी में मिल जाना, कभी हँस... Read more

निकृष्ट कवितायेँ !

व्यापक नही हैं संकुचित हैं अब, 'कविताओं का दायरा' यहाँ अब भी जद्दोजहद होती हैं घंटों... छंदों में, तुकांत में, मात्राओं में... Read more

कटुसत्य

चमक भी पैसा दमक भी पैसा आटा भी पैसा नमक भी पैसा नाम भी पैसा काम भी पैसा तीर्थ भी पैसा धाम भी पैसा रूप भी पैसा रंग भी पैसा ... Read more

प्रेम की परिभाषा

प्रेम नहीं शादी का बंधन प्रेम नहीं रस्मों की अड़चन, प्रेम नहीं हैं स्वार्थ भाषा प्रेम नहीं जिस्मी अभिलाषा प्रेम अहम् का वरण नही... Read more

दोस्ती में कचरा !

वो कोन था? राजेश ने सहमकर पूछा। "वो..वो दोस्त है।" "क्या सच में वो दोस्त ही है?" "लोगो के दिमाग में ना जाने क्या कचरा भरा होता ह... Read more

गरीब का ए. टी. एम्.

मेरे देश का गरीब, वह ए. टी. एम्. है जिसमे लगता है जब भी शासन की कुटिल, लच्छेदार और 'समझदार' नीतियों का डेबिट कार्ड, तो बाहर आत... Read more

माँ और बाप

आस्थाओं की आस्था प्रेम की पराकाष्ठा निज का दफ़न ताप, माँ और बाप .. आंसुओं के नद परवाह की हद अपनेपन की अमिट छाप माँ और बाप ... Read more

मिला हूँ जो तुझमे, तो तेरी छवि हो गया हूँ ..

मिला हूँ जो तुझमे, तो तेरी छवि हो गया हूँ ढलते उजालों का जैसे, मैं रवि हो गया हूँ कोई कहता हैं पागल, कोई कहता दीवाना, लोग देते ... Read more

आदमी की औक़ात

सिरे से खारिज़ कर बैठता हूँ, जब सुनता हूँ की चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ हैं आदमी, सजीव हो उठती हैं, नहीं आखों से हटती ह... Read more

मैं यूँ तो "भीष्म प्रतिज्ञ" नहीं !

मैं यूँ तो "भीष्म प्रतिज्ञ" नहीं, जो वचनों पर डटता आता .. हाँ केशव सी निश्छलता में, ख़ुद को उसके सम्मुख पाता. है अर्जुन जैसा ध्यान ... Read more

कभी हार कर भी तुम्हे पा लिया..

कभी हार कर भी तुम्हे पा लिया, कभी जीत कर भी मुँह की खानी पड़ी कभी अनहद फासलों से भी तुम मुझे ताकती रही, कभी नजदीकियों से भी मु... Read more

कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है?

कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है फिर भी ठंड का इतना मज़ा क्यों है? ये सिहरन, ये ठिठुरन ये गरमाई क्यों है देर से उठने की अंगडाई ... Read more

फिल्मों वाले अपराधी !

फुटपाथों पर सोने वाले, आज खून के आंसू रोते, समझ गये हैं फिल्मों वाले, नही कभी अपराधी होते, समझ गये हैं पैसे वालों, का रुतबा अब भ... Read more

माँ तुम एयरपोट न आना.. .

सेना से गर फ़ोन जो आये मैं ना बोलू और बताये पागल सी तू पता लगाये जो माँ तेरा दिल घबराये मुझको गर अपना समझे तो तू ना गलत अंदाज़ लग... Read more

तुम लगी घाव पर मरहम सी..

मेरे सुख दुख से परिचित सी एक गूढ़ नियंता बन बैठी, तुम लगी घाव पर मरहम सी, दिल की अभियंता बन बैठी जो गयी ठेलकर मुझको कल, जिस भीड़ ... Read more

प्रेम का 'सैक्सी'करण !

जिस दिन मुन्नी की बदनामी को हंस कर देश ने स्वीकारा था जिस दिन शीला की जवानी पर, बुड्ढे तक ने ठुमका मारा था मारा था शालीनता को , ... Read more

कहानी : अनसुलझी पहेली

"कल सुबह तुमसे मैट्रो पर मिलना है" किशन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, जब उसने नव्या का ये मैसेज देखा। आखिर कितने दिनों के बाद नव्या ... Read more

'साहित्यपीडिया' का कहर !

बदस्तूर जारी हैं साहित्यपीडिया का कहर, इस कदर की कल तक जो कवितायेँ रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ाती थी , या कुछ अनभिज्ञों द्वारा ... Read more

माँ तेरे एहसान !

तेरा बचपन में मुझे पुचकारना मेरी गलतियों पर फटकारना, माथे पर काला टीका लगाना; थपकियाँ देकर सुलाना नहीं भूल पाउंगा कभी मरने के... Read more

चुपके से निखरी रातों में. .

बिन बारिश के मौसम में, तेरा बरसना मुझे याद हैं उन दो कजरारी अखियों का, तरसना मुझे याद हैं, चुपके से निखरी रातों में, तेरा दिल में... Read more