Dr. Mudassir Bhat

Srinagar

Joined December 2016

श्रीनगर जम्मू-कश्मीर से, धरती के उस हिस्से से जिसे स्वर्ग कहा जाता है. इसी स्वर्ग की वास्तविकता को दर्शाने के लिए “स्वर्ग विराग” काव्य-संग्रह की रचना हुई है, जो चंद्रलोक प्रकाशन कानपुर के प्रकाशित हुआ है.
कब से ढूंढ रहा हूँ खुद को
मुझमें मेरा कुछ भी नहीं हैं.

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क्या तुम नहीं जानते

क्या तुम नहीं जानते क्या तुम नहीं जानते मछलियों से छीना गया है जल जला दी गई है पूरी वितस्ता तट पर हो रहा है तांडव नृत्य म... Read more

बीत गया है पूरा साल

कब तक करे अब हम मलाल बीत गया है पूरा साल, फिर शहर में न हो बवाल बीत गया है पूरा साल. क्यों किये थे वादे हमसे जो पूरा न कर ... Read more

यही स्वर्ग है

ढक रही हैं चोटियाँ... बर्फ़ से, चारों ओर दिख रहा हैं एक मासूम मंज़र हर पाखंड और फरेब से परे ढक रहा है बिखरा खून भी ढक ... Read more

फूलों में बारूद

तुम्हे शोभा नहीं देता कि तुम आंसों बहाओ आँखें फोड़कर तुमने बेच दी नदी चील को और मगरमच्छ को चिनार तीक्ष्ण चोंच और पैनी नज़र म... Read more

मुझे खेद है

मुझे खेद है उनके प्रति जिनको कुत्तों से दोस्ती है चील कौओं के जलसों से जो होते है संबोधित, जिनको गीदड़ में दिखता है क्रांति का ... Read more