Motilal Das

Joined November 2018

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शीर्षकहीन

आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू चूल्हे की आंच में क्यों जलती है तू Read more

शीर्षकहीन

खुदा भी आसमां से इस जमीं को देखता होगा इस जमीं को खून से किसने रंगा सोचता होगा Read more

शीर्षकहीन

कभी कभी ही कोई शब्द गूंजता है जेहन में और उभरती है कोरे कागज में एक मुक्कमल कविता । Read more

शीर्षकहीन

कभी कभी ही कोई शब्द गूंजता है जेहन में और उभरती है कोरे कागज में एक मुक्कमल कविता । Read more

शीर्षकहीन

मेरी तमन्नाओं की तक़दीर तुम संवार दो जीने की बहार का मतलब तुम समझा दो Read more

शीर्षकहीन

जिन्हें हम भूलना चाहें वो ख्वाबों में आ बसते हैं जरा बता ये वक्त ज़माने को ऐसा क्यों कर होते हैं Read more