Motilal Das

Joined November 2018

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डर

उसने कुछ कहा मैंने कुछ सुना कुछ सुन न सका उसने साफ कहा तुम डरे हुए हो मैं कैसे कहता कि तुम भी मुझसे डरे हुए हो. Read more

डर

आँखें चौन्धिया गई उस डर के खबर पर लिखा था जिसमें डर की वज़ह और मेरे डर में उसका डर पैठ गया. Read more

अँधेरा

एक दीपक मेरे साथ चलने को है तत्पर अंधेरों के विरुद्ध मैं कैसे कहता उसे तू न चल मेरे साथ मैं ही तो हूँ वो अँधेरा. Read more

डर

मुझे डर लगता है किसी बंदूक से नहीं किसी हिंसा से नहीं बल्कि तुम्हारे विचारों से विचारों के नाख़ून इतने पैने होते हैं कि मेरे ... Read more

शीर्षकहीन

तुम्हारे चेहरे के आईने में मैं अपना अक़्स ढूँढू मेरे चेहरे के आईने में तुम अपना वफ़ा ढूंढो Read more

शीर्षकहीन

एक प्यार का नगमा है जीवन की यही कहानी है तू जो मिले इस जीवन बस यही तो बहता पानी है Read more

शीर्षकहीन

आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू चूल्हे की आंच में क्यों जलती है तू Read more

शीर्षकहीन

खुदा भी आसमां से इस जमीं को देखता होगा इस जमीं को खून से किसने रंगा सोचता होगा Read more

शीर्षकहीन

कभी कभी ही कोई शब्द गूंजता है जेहन में और उभरती है कोरे कागज में एक मुक्कमल कविता । Read more

शीर्षकहीन

कभी कभी ही कोई शब्द गूंजता है जेहन में और उभरती है कोरे कागज में एक मुक्कमल कविता । Read more

शीर्षकहीन

मेरी तमन्नाओं की तक़दीर तुम संवार दो जीने की बहार का मतलब तुम समझा दो Read more

शीर्षकहीन

जिन्हें हम भूलना चाहें वो ख्वाबों में आ बसते हैं जरा बता ये वक्त ज़माने को ऐसा क्यों कर होते हैं Read more

अस्मिता एवं अस्तित्व से जूझती कविताएँ

अस्मिता एवं अस्तित्व से जूझती कविताएं - मोतीलाल जब हम कविताओं पर बात करते हैं तो बरबस हमारे ख्याल में यही आता है कि आखिर ढेर सार... Read more

माँ

माँ मैं रोज सूरज के उगने और सूरज के डूबने की प्रतीक्षा करती हूँ. रसोई में चूल्हा जलाती हूँ तब मेरे लिए सूरज उग जाता... Read more