मोनिका Sharma

मुरादाबाद

Joined November 2016

संक्षिप्त परीचय :-
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पूर्ण नाम: मोनिका शर्मा
साहित्यिक उपनाम: मासूम
पिता का नाम — स्व. विनोद शर्मा
माता का नाम– श्री मति ऊषा शर्मा
विधा: गीत, ग़ज़लें, दोहे, मुक्तक

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उडृे पतंग वो कैसे कि जिसमे डोर नहीं

उड़े पतंग वो कैसे कि जिसमे डोर नहीं बिना घटा के कभी नाचता है मोर नहीं तू ही मुकाम है मेरा तू ही मेरी मंज़िल चुनू मैं राह वो कैस... Read more

होते ज़मीं तो शिकवा न करते ज़बां से हम

होते ज़मीं तो शिक़वा न करते ज़बां से हम मुमकिन नहीं सवाल करें आसमां से हम नज़रों में उनकी हो गये अन्जान इस कदर वो कह के चल दिय... Read more

....और मैं हूँ

फ़क़त इक रास्ता है और मैं हूँ सफर दिन रात का है और मैं हूँ है मीलों दूर तक सहरा ही सहरा हवा का दबदबा है और मैं हूँ मसलसल आज़... Read more

ये दो आँखें....

किसी को पाने का प्रयास है ये दो आँखें किसी के होने का अहसास हैं ये दो आँखें हैं जितनी दूर ,उतनी पास हैं ये दो आँखें नज़र भर दे... Read more

अजब दुनिया है ए मालिक....

अजब दुनिया है ऐ मालिक ग़ज़ब इसके नज़ारे हैं कहीं आखों में पानी है कहीं जलते शरारे हैं कहीं मूरत करे भोजन मजारों पर चढ़े चादर क... Read more

न जाने ज़माने को क्या हो गया है

न जाने ज़माने को क्या हो गया है यहाँ हर कोई दौड़ने में लगा है मची होड़ है यूँ निकलने की आगे कहीं कुछ न कुछ छूटता जा रहा है क... Read more

धूप

मंद मंद मुस्काती धूप सकुचाती, शर्माती धूप आवारा मेघों के डर से घूंघट में छुप जाती धूप आंख-मिचौली खेल रही है छत पर आती जाती ... Read more

यहाँ "मासूम" रुकना था मगर जाने की जल्दी थी

हमें उनकी पनाहों में ठहर जाने की जल्दी थी उन्हें भी हमको तन्हा छोड कर जाने की जल्दी थी हम उनकी बात पर थोड़ा यकीं करने लगे थे अब ... Read more

बाँध कर लाये थे ज़ुल्फ़ों में वो काली रात भी

थी जुबां खामोश पर वो कर रहे थे बात भी खोल आँखों ने दिये मन के सभी जज्बात भी अश्कों ने फिर प्यार का इजहार कुछ ऐसे किया ज्यों सुन... Read more

चाँदनी "मासूम" झुलसी जा रही है दोपहर में

यूं धुआँ छाया नज़र में है सुकूं बाहर न घर में गुमशुदा है ज़िंदगी यूं चिट्ठियाँ ज्यों डाकघर में रंग चेहरों का उड़ा है खून ह... Read more

दिल ये हिंदुस्तान सरीखा लगता है

जीवन इक उन्वान सरीखा लगता है बिन माँगा वरदान सरीखा लगता है देख दूसरों को मन अपना फूंक रहा हर इंसाँ श्मशान सरीखा लगता है बाग़... Read more

"मासूम" घर आँधी ने उजाड़ा नहीं कभी

सीने में आइने के तु झांका नहीं कभी इसने भी राज़े दिल कोई खोला नहीं कभी तेरे ही सामने हँसा तेरे वजूद पर झूठा नहीं ये, सच तुही सम... Read more

आप अपने बड़े किरदार संभाले रखिये

जीस्त कर के ये धुआं, हाथ उजाले रखिये दीप छोटा सही पर राह में बाले रखिये करना मज़बूत हो ज़ेवर,तो खरे सोने को झूठ बइमानी के खांचे... Read more

मैं हूँ ज़िंदा तुझे एहसास कराऊं कैसे

धङकनें मैं तेरे कानों को सुनाऊं कैसे बंदिशें तोङ तेरे सामने आऊं कैसे मुझको बेजान समझ दूर करे क्यों तन से मैं हूँ ज़िंदा तुझे एह... Read more