मैं मंजूषा मन, लेखन ही मेरा जीवन है, मन ने जो महसूसा वह लिख दिया। जीवन के खट्टे मीठे और कड़वे अनुभवों का परिणाम है मेरी कविता, मेरा लेखन।

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एक मुक्तक..

दिल को इसमें बड़ी ही राहत हो। रात दिन तेरी ही इबादत हो। सौ जनम भी अगर मिलें हमको, हर जनम में तुम्हारी चाहत हो। मंजूषा मन Read more

ज़िंदाबाद

एक मई पर.... ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद मजदूर दिवस ज़िंदाबाद... ज़ोर ज़ोर से नारे लगती भीड़, अधिकारो की मांग, नारों... Read more

कविता

और दर्द दो तुम मुझे और दर्द दो और ज़ख्म दो और दो पीड़ा ये तो तुम्हें लगता है... कि तुम दर्द दे रहे हो ज़ख्म दे रहे हो ... Read more

दोहा

दोहा खेवनहारा आप ही, छोड़े जब मझधार। कैसे हो पाए कहो, जीवन नैया पार।। मंजूषा मन Read more

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें जंगल सी घनी हैं तुम्हारी यादें ऊँचे ऊँचे पड़े सटकर खड़े है बीच से गुजरती हवा सरसराते पत्तों का शोर सुकून देत... Read more

बेटियाँ

बेटियाँ बेटियाँ, बचपन से ही अपने माता पिता की 'माँ' बन जातीं हैं, नन्ही हथेली से सहलाती हैं पिता का दुखता माथा, छिंतीं है... Read more

नमक

दाल में चुटकी भर नमक की घट- बढ़, पल में पहचान लेते हो तुम... फिर क्यों जीवन भर साथ रहकर भी नहीं पहचान पाते तुम मेरे आ... Read more