महेंद्र सिंह किरौला

Matela Almora , Uttrakhand

Joined January 2017

महेंद्र सिंह किरौला पुत्र श्री कुंवर सिंह किरौला एवं स्वर्गीय श्रीमती अनुली देवी किरौला का जन्म ७ फरबरी सन १९८५ को दिल्ली महानगर के पालम मे हुआ था.
४ वर्ष की उम्र मे ही दिल्ली शहर छोड़कर वह उत्तराखंड के जिला अल्मोड़ा के एक छोटे से कसबे मे अपने परिवार के साथ पलायन हुए , जैसे कि साहित्य प्रेम की नियति अपना निर्माण खुद ही कर रही हो. जनता इंटर कालेज गुमटी, मे अपनी शिक्षा ग्रहण करते हुए, हिंदी मे बाल्यावस्था से ही बहुत रूचि रखने वाले बालक के जीवन मे आशा कि किरण २० अक्टूबर सन १९९९ को जगी, जब कि उसने पहली कविता (स्वप्न : साहित्य प्रेम का बीज) लिखी, और बर्ष २००० मे वाद-विवाद प्रतियोगिता मे जिला अल्मोड़ा मे स्वर्ण पदक का सम्मान प्राप्त किया. और कई प्रितियोगिताओ मे भाग लेकर अपने मनोबल को बढ़ाया एवं कई बाल कविताये लिखी, विज्ञानं बर्ग मे होने के बावजूद हिंदी से अत्यधिक प्रेम उसे अपनी और आकर्षित करता रहा, खेद ! जीवन के कठिन वैकल्पिक और संकरे रास्ते ने कुछ वर्षो तक फिर उसका ;प्रेम छीन लिया. मगर एक फिर चमत्कार हुआ और फिर आज अपनी कई रचनाओ के साथ महेंद्र उत्तरी अमेरिका मे समय का सदुपयोग साहित्य कि सेवा मे कर रहा है हालाँकि व्यवसाय से वो एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी मे जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत है.
महेंद्र ने अपने ब्यवसाय मे भी कई योगदान दिए है, जैसे कि उन्हें मास्टर मिक्सोलॉजिस्ट, बारटेंडर ऑफ़ दी ईयर, परफेक्ट व्हिस्की टेस्टर एवं डायनामिक मेनू इंजीनियर का ख़िताब मिला है, समस्त हिंदुस्तान मे प्रेस ट्रस्ट से प्रकाशित कई रेसिपीज उनकी है. बतौर कंसलटेंट के उन्होंने कुछ शहरो मे भी काम किया, भारत के अलावा यूनाइटेड अरब अमीरात, नार्थ अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका,जॉर्डन मे भी अपना योगदान दिया है.

Books:
naya yug naye soch

Awards:
rachana samman 2016

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करवाचौथ

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मन्नू की आत्मजा

मि मि मि मि बोल रही है करवट लेकर वो लेटी है शायद अब पहचान हो गई ४ महीने की मेरी बेटी है मम्मी पल भर दूर चली तो उसको अब यत्र त... Read more

कहार

क्षितिज पर दिखते है वो कहार, इस क्षण नयनो को मेरे यार, झरने दृग जल के बहते है उसमे बैठा है मेरा प्यार. उनसे एक बात थी कहनी, स... Read more

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कैसा जीवन यापन करता वो सबके पात्रों को भरता समाज और परिवार के साथ समय बिताने को वो मरता . दिनचर्या को अपनी भूलकर आधुनिक जीवन ... Read more

सखी और सम्बन्ध

न कोई है रिस्ता न कोई है नाता शायद इसे लिखने भूले बिधाता अगर धागे उससे जुड़े ही न होते तो हर रोज उसको क्यों झरोखे मे पाता निरंत... Read more

सत्य धरा का

सत्य है कुछ नहीं धरा पर सिवाय उस अजेय मृत्यु के जन्म सच नहीं कर्म सच नहीं ये सामाजिक बंधन और रिवाज साथी सच नहीं, शादी सच नहीं ... Read more

प्रेम शांति और सामंजस्य

प्रेम शांति और सामंजस्य अपना लो फिर अमन का चिराग जलालो जो बीज नफरतो के बो गए वो अब सास्वत ही सो गए बृक्ष काँटों के हटा कर एक ... Read more

स्वप्न : साहित्य प्रेम का बीज

कल रात, हिंदी, अंग्रेजी, विज्ञानं मे डिक्टेशन थी आयी जिला अल्मोड़ा मे मैंने प्रथम श्रेणी थी पायी जगह जगह से लोग आये थे देने मुझे ब... Read more

अतीत की झंकार

अतीत की झंकार से न डर ये तेरा भविष्य नहीं इससे जुड़ा है ये मगर कोई प्रलाप-विलाप न कर महत्वकांशा, याद रख लक्ष्य कठिन परिश्रम की ब... Read more

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एक रात महासागर किनारे, प्रसिद्ध चिंचिलाद के द्वारे, मनोरंजन , सोमरस मे लिप्त, भीड़ मे हम और हमारे. मदिरा का अनियंत्रीत पान, औ... Read more

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चार औरतें कोने मे परस्पर करती बात सकरपुर की उस गली मे उस रोज काली भयंकर रात ब्याकुल सारे लोग थे लेकिन वो छोटा बच्चा रोता था ... Read more

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