मूलतः ग्वालियर का होने के कारण सम्पूर्ण शिक्षा वहीँ हुई| लेखापरीक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हुआ|

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अंक गणित

मेरे तुम्हारे संबंध आंकड़ों की भाषा में छतीस जैसे नहीं हैं तैतीस भी नहीं हैं । हम इससे खुश हैं अंक बारह और इक्कीस और ऐसे ही अ... Read more

दिसम्बर जनवरी में

धूप जाड़े की कि जैसे भीड़ भाड़े की । रात जाड़े की कि ज्यों मलखम अखाड़े की । हवा जाड़े की कि ज्यों कंबल कबाड़े की । पढ़ाई जाड़... Read more

बेरोज़गार पति उवाच

तुम्हारे आने से तुम्हारे जाने तक समय का अंतराल ऊँट के मुँह में जीरा लगता है । तुम्हारे जाने से तुम्हारे आने तक राम राम करते ... Read more

अनजले दीप

“शांति” का दीपक बुझे ना, यह जरूरी आजकल जला लेंगे शेष दीपक, हैं बुझे जो आजकल । “उत्साह” दीपक जले को, वे बुझाते फूंक कर चोरियों... Read more

माँ की महिमा

ज्ञानवती होती है माता, मन की भाषा पढ़ लेती है । संतानें कब क्या चाहती, अनुभूति से तड़ लेती है । इतने गहरे मनोज्ञान को, कैसे मैं कवित... Read more

आस्तीन के साँप

धुआँ उठा हैं, सुलग रहा कुछ छुपे हुए अंगारों से । वर्षा फिर से मेहरबान है वामांगी गद्दारों से । हवा देखिये मेघ देखकर उन्हें उड़... Read more

नमन

अटल तन नहीं होता अटल होता है व्यक्तित्व व्यक्तित्व पलता है विवेकशील चिंतन से तर्कशील मनन से व्यष्टि के हवन से ॥ अटल व्यक्तित... Read more

सच्चाई

नहीं कोई भी सर्वेसर्वा सब की हैं सीमायें । जब जानें श्रावण भादौ में बादल नहीं छायें । चुकता हो चुकती है किरणें बादल से लड़-भिड़... Read more

कुण्ड‌‌‌‌‌‌‌‌लियाँ

कद काठी में वे बड़े, ऊपर से धनवान । धनवानों का खासकर, अफसर रखते ध्यान ॥ अफसर रखते ध्यान, कहें जो वे करते हैं । नीरव जैसे संत, इन्ह... Read more

समाज को दर्पण दिखाती दो कुण्ड़लियाँ

समाज को दर्पण दिखाती कुण्डलियाँ ऋण लिया और घी पिया, किया बैंक को भ्रष्ट । भोगवाद से देश की, मानवता है तृष्त ॥ मानवता है तृष्त, ... Read more

कविता कलश

नव गीत, कविता, अकविता गुदगुदाती क्षणिक क्षणिका और भी ऐसा बहुत कुछ हायकू या माहिया और जाने क्या क्या आज का कविता कलश । आज की... Read more

जय जय जय बजरंगबली

अंजनी सुत पवन पुत्र ने वनवासी मित्रों को संग ले कदम कदम पर राम राम भज ढूंढ लिया लंकेश छली । जय जय जय बजरंगबली । थे संगठित व... Read more

जाने क्यों ?

कलम रुकी है जाने क्यों ? अधर मौन हैं जाने क्यों ? सत्य झूठ है सब कुछ सम्मुख फिर भी चुप है दर्पण क्यों ? रहा हितैशी जन मन का जो... Read more

मन मस्त फकीरी धारी

धीरे धीरे बढ़ते आगे जब से लगन लगी तेजी से बढ़ने की खातिर हम क्यों करें ठगी ? मन के माफिक कदम चलें तो कुछ कह लेते हैं सह -मात क... Read more

मैं आदमी हूँ ख़ास

मैं आदमी हूँ खास रोजाना सुबह से शाम तक निकालता हूँ बाल की खाल फिर बुनता हूँ मकड़जाल कोई फसे क़ामयाब हो चाल | जागने से सोन... Read more

जीवन प्रवाह

अक्र बक्र दो नदी किनारे बीच बहे जीवन की धारा | गंगा सागर में मिलने तक सुख-दुःख ये ही सहें हमारा | दो कंधों से सटा रपटता ... Read more

हो ली जो होनी थी

होली जो होना थी कल तक सन चौदह तक आते आते । वंशवाद, जनवादी देखे सहिष्णुता से बैर बढ़ाते । प्रह्लाद को जला न पाये वाद प्रमादी क... Read more

कैसे उड़ें गगन

हलका मन है; तन भारी है कैसे उड़ें गगन । पैर मिले बस, पंख नहीं हैं, जिन पर ढ़ोकर तन । मन ही मन में हँस हँस करके देखा करें गगन । ... Read more

अम्बर पुकारे

गतिशील रहना धरती सिखाये निस्वार्थ सेवा सूरज सिखाये चलती है सृष्टि इन्हीं के सहारे । न सोता है सूरज न थमती है धरती दोनों के तप ... Read more

कैसे हरूँ मुरलिया

बंसीधर ने जब जब बंसी बाजुबन्द में बांधी । चिंतित हो कह उठते ग्वाले आने को है आंधी । मोर मुकुट का पंखी चंदवा गत आगत का ज्ञात... Read more

हर क्षण नारायण नारायण नारायण गाएँ

माँ के गर्भ कैद से जीवा मुक्त करो हे राम पुकारे | जग में आकर बाहर भूले दुःख के नाम उचारे | भेज ले हर का नाम, कि ताकि पुनर्ज... Read more

आल इज वैल

भले भले ही बुरी लगे इतनी बात सही है जो दुखी है या सुखी है ढोता है कर्मों का शैल नथिंग इज़ रॉन्ग, ऑल इज़ वैल। पहले भी धरती हिलती... Read more

उसे पसंद करने वाला कोई नहीं हैं

मेरी बेटी कविता चालीस की हो रही है उसे छै सौ से अधिक लोग देख चुके पर पसंद न होने की बात जहाँ की तहीं है | उसे कोई पसंद कर... Read more

हँसी और मुस्कान की बस्तियाँ

बहुत दूर गुमगयीं बस्तियाँ हँसी और मुस्कानों की । जीवन की दो सगी सहेली मोहताज पहचानों की । भागी हँसी छोड़कर आंगन हँसने बाग बगीच... Read more

मांं सरस्वती

यमुना प्रेम, भक्ति की गंगा सरस्वती श्रद्धा की धारा प्रेम, भक्ति में देख खोटपन वाणी ने बच किया किनारा | स्वारथ ने संबंध प्रेम क... Read more

लाल बहादुर शास्त्री जी का स्मरण

लाल बहादुर जैसा कर्मठ, भारत माँ का प्यारा पाकिस्तान पराजित करके, खुद किस्मत से हारा दुष्ट पाक की कूट्नीति ने, पलटा जीता पास... Read more

रावण की ओर से शुभ कामनाएँ दशहरे की

हँसकर रावण बोल रहा है आज यदि होते श्री राम कितने रावण मार गिराते ? इतने तीर कहाँ से लाते ? आ भी जाते चल भी जाते बचता कौन ? स... Read more

कहाँ छुपे तुम तात विभीषण ।

छाती सहती नित पद प्रहार हो रही सहिष्णुता तार तार हम भाई समझ कर बार बार न्योछावर करते रहे त्राण वे सब तो निकले खर दूषण कहाँ छ... Read more

अंगूठा दिखाना गजब हो गया

उनका अंगुठा बताना गजब हो गया तमाम हमउम्र लड़कियों और उनकी चाहत कोअंगूठा दिखाने वाला खुद धोखे में आ गया जब उसे अंगूठा बताय... Read more

तुम्हारे बिना

तुम्हारे बिना मन नहीं लगता तुम्हारे साथ रहना मुझे आनंद देता है हर जगह दिन में भी रात में भी । अमेरिका में तुमसे मेरा मन ज... Read more

जहाँ न पहुँचे रवि वहां पहुँचे कवि

ऊर्जा के स्रोत रवि तुम, युगधर्म पालक अहर्निश सिखाते जीना जगाना, अज्ञान-तम को दे दविश अन्याय अत्याचार हों जब, न्याय को करके किना... Read more

मैंने गज़ल लिखी (2)

नहीं दिखी धूप तो उदास हो गए दो दिनों से रुकी हुई प्यास हो गए । देखी जो आज सुबह, धूप गुनगुनी मुरझाए गीत मधुमास हो गए । होत... Read more

कहकर हर हर गंग

अपनी अपनी विवेचना को कह कर वे सत्संग । तम सागर में हमें डुबाते कहकर हर हर गंग ।। धर्मार्थ प्रयोजित कालाधन करे धर्म बदरंग । करे... Read more

तास के पत्ते

धरती ढीली हो, माटी गीली हो सांस लेने निकल आते, जमीन मे छुपे साँप, बिच्छू, कुकर्मुत्ते लगा लगा छत्ते । धरती कड़ी हो, दरारें... Read more

एक स्वप्न

एक तरइया पापी देखे दो दिखें चण्डाल को । तीन तरइयाँ राजा देखे सब दिखें संसार को । होश संभाला जब से मैंने तब से गगन निहारा । ... Read more

विडम्बना

ममता मरी समता मरी अतृप्ति जीवित । मानवी संवेदनाएँ चुक गयीं होकर व्यथित । घर छोड़ती हद तोड़ती गृह लक्ष्मी विश्वास को ठेंग... Read more

गर्मी

सूरज की शहजादी गर्मी, सर्दी निकली घर से निकली मन में जन कल्याण बसाये जल संग्रह करने अषाढ‌ तक तीन माह की सघन साधना रीते बादल भर... Read more

देश भक्ति की विजय गुँजाना

किसके नाम लिखूँ मैं पाती तूँ ही बता पवन वासन्ती मन मन जहर घोलकर पछुआ ठहरा रही हमें ही घाती । सूरज के पहारेदारों ने जब से धूप बा... Read more

कुछ दोहे

कविता किरकी कांच जस, हर किरके को मोह । छपने की लोकेषणा, करे छंद से द्रोह । आत्म मुग्ध लेखन हुआ, पकड़ विदेशी छंद । ताका, महिया, ह... Read more

लगे सभी कुर्सी कब्जाने

यहाँ चली है बहस गधों पर कब्रिस्तानों, श्मशानों पर साइकिल- हाथी चिह्नों पर उत्तर-प्रत्युत्तर के चलते प्रजातंत्र के अजब नमूने सभी... Read more

राजनैतिक विष

कैसे कैसे पागल नेता, कुछ भी कहते रहते हैं । और हम, पिछलग्गू बन, सब कुछ सहते रहते है। होश संभाला जब से हमने, मिला हमें यही ... Read more

घी उधार का पीने वाले

कहने की बातें कुछ और करने की बातें कुछ और आजादी के बाद देश में चला हुआ है ये ही दौर बात गरीबों की कर कर के माला माल हुए नेताजी ... Read more

मेरा अभिषाप

गीत चल दिये जाओ.... मैं रोक नहीं सकता तुमको पर ध्यान रखो तुम अपराधी हो तुमने मेरे अरमानों का खून किया है आरोपों से मुक्त नहीं... Read more

उम्र बहुत थोडी पाते हैं

यदा कदा ही तो आते हैं भारत के रख वाले उम्र बहुत थोड़ी पाते हैं, देश जगाने वाले कोलकता की काली माँ से देव तत्व को पाकर सन्यासी बन... Read more

प्रभु के चरण

माना है जब से सुख को सपन दुःख में भी खुश हैं तब से अपन सामर्थ इतनी देना विधाता मुरझाए न दुःख में तेरा चमन दिन चार रहना सुख... Read more

भ्रम

मानव मन ने निराकार के, जो जो रूप गढ़े पीढ़ी दर पीढ़ी ने उनके, मंदिर किये खड़े धनुष कमान एक को देकर झापित राम किया मोर मुकुट औ... Read more

......की तरह

भाड़े की भीड़ जाडे‌ की धूप अधिक साथ नहीं देती खुशियों की तरह धूप का आतंकी रूप डरा डरा सा है अपनों के आतंक सेc पड़ौसियों की तरह... Read more

फिर वसन्त आया …

सूरज की किरणों ने पोर पोर चूमा अलसाया सूर्य-कमल मस्ती में झूमा मंद पवन झोकों ने, वन-चमन महकाया.... पेड़ों पर तरुणाई, वलनाती बेल... Read more

मेरी बेटी

बेटों से ज्यादा मां बाप को प्यार करे मेरी बेटी । दो घरों का तन-मन से ध्यान धरे मेरी बेटी । बिटिया न होने के कारण है दुखी मे... Read more

राष्ट् कवि मैथिली शरण गुप्त ( जन्म : ३ अगस्त १८८६)

चिर प्रतिष्ठा चिरगांव गाँव को देने वाले 'दद्दा' देश नमन करता है तुमको ह्रदय बसाये श्रद्धा तीन अगस्त अठारह छियासी, जनपद झाँसी में ... Read more