Jayanti Prasad Sharma

Aligarh(U.P)

Joined November 2018

सागर, सरिता, सरोवर, छोटी नदी, नाले, पोखरों, यहाँ तक कि गड्ढो के जल में भी तरंगें उठती रहती हैं। मानव मन भी भावनाओं का सागर है, सरिता है और सरोवर है जिसमें भाव ठाठें मारते रहते हैं। उनमें उद्देलन होता रहता है तथा तरंगें पैदा होती रहती हैं। औरों की तरह मेरे मन में भी भाव तरंगित होते रहते हैं।इन्हीं तरंगित भाव को समेटता हूँ तथा टूटे फूटे शब्दों से विन्यास कर कविता के रूप में परिवर्तित करने का प्रयास करता हूँ। मेरा यह कार्य स्वयं को कवि के रूप में स्थापित करना नहीं है वरन अपने भावों को साझा करना है इन्हीं भावों को रचनाओं के रूप में ब्लॉग “मन के वातायन” में बड़ी धृष्टता और क्षमा याचना के साथ प्रस्तुत करता हूँ।
mankevatayan.blospot.com

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जीवन है संग्राम

बन्धु रे जीवन है संग्राम, निज अस्तित्व बचाने को, लड़ना पड़ता है आठौ याम। कभी समाज से कभी सिद्धांत से, कभी अपने मन की उद्भ... Read more

माँ की ममता की छांव

जब भी किसी ने मुझे सताया, माँ ने मुझको गले लगाया। जब भी दुखों की धूप से झुलसा, माँ ने ममता का छत्र लगाया। ... Read more