I am a professional astrologer and very much active in the field of poetry

Copy link to share

मोक्ष भी

काव्य साधना न व्यर्थ है कभी सदैव जान ये मनुष्य को सदा मनुष्यता सिखाती हैI शारदा कृपा विशेष हो तभी मिले कवित्व छन्दसिद्धि देवतु... Read more

पुण्यपताका ले के

क्या कहीं पुष्प खिला पुण्यपताका ले के। कौन है आज मिला पुण्यपताका ले के।। आसुरी वृत्ति बढ़ी भोग बढ़ा है जैसे, गिर गया मित्र! क़िला ... Read more

पुनीत लिखूं

वर दो जगदम्ब कि लेखन में भर शक्ति व सत्य सुगीत लिखूं मन निर्भय होकर झूम सके अब वैर नहीं बस प्रीत लिखूं रसपूर्ण सुछंद सदैव रचूँ मन ... Read more

पिपासा

न तृष्णा रही शेष ही आज कोई न है ब्रह्म को जानने की पिपासा नहीं चाहता मोक्ष को भी सुनो मैं नहीं बन्ध कोई लगा है भला सा नहीं चाहता... Read more

तेज

शास्त्र कहे रवि ने निज तेज उठाकर पावक में जब डाला। दीपक लौ घृत संग प्रदान करे हमको तब स्वस्थ उजाला। पूजन वन्दन हेतु प्रयुक्त हुआ क... Read more

वन्दन है

वन्दन है उस गर्भ का जहाँ रहा नौ मास। जननी का मुझको प्रभो! मात्र बना दो दास। मात्र बना दो दास, पिता की सेवा कर लूँ। पापार्जन को त्... Read more

महेश भी

देखते ही देखते ये जीवन बदल गया, और बदला है मम राष्ट्र परिवेश भीI कोई चीर से विहीन करता सरस्वती को, कोई खींचने लगा है जननी के क... Read more

आ गये

नारिकेल और मृदु नीम के सहस्त्रों वृक्ष देखे तो ये दृश्य मेरे चित्त में समा गये। मन्दिरों का वास्तु यमदिशा में अलौकिक है ग्राम मी... Read more

हम तुम्हे पूजते ही रहेंगेI

हम तुम्हे पूजते ही रहेंगेI भक्ति की भावना को गहेंगेI विश्व में चोर मक्कार तो क्या? गंग के नीर सा हम बहेंगेI तन्त्र कोई रहे... Read more

कला और ज्ञान के

पत्रक प्रसन्न ललचायी लेखनी को देख, फैलायी है काया चौकी पर शैय्या मान के। आयी है प्रिया सजाने मुझे मसि द्वारा आज, अद्भुत मैं क्षण ... Read more

इन्द्र मेघ भेज दो

बड़ा प्रचण्ड ताप अंश में इसे न माप दीन का हुआ विलाप क्योंकि देह थी जली हुई न पुष्प ही खिला न वृक्षपत्र ही हिला न काल में दया दिखी व... Read more

मान भी मिलने लगा

चाटुकारों से विलक्षण ज्ञान भी मिलने लगा वोट के हित द्रोहियों को ध्यान भी मिलने लगा क्या कहूँ, सम्वेदना की मृत्यु होती देख के आ... Read more

ब्रह्म से बड़ा

वेदप्रोक्त काव्य शिल्प साधना सदैव मान शारदा कृपा निमित्त शब्द का श्रृंगार है। जो करे विलोम साधना उसे अशुद्ध जान आसुरी प्रवृत्ति स... Read more

मनुष्यता नहीँ गयी

सूर्य अस्त की दिशा अतीव भा रही परन्तु ध्यान दो विवेक नष्ट, रुग्णता नहीं गयी। दिव्य शक्तियाँ विलुप्त भोग ही प्रधान रंग खोज रुद्ध क... Read more

कविता

शुभ प्रेरक तत्त्व समाहित हों जिसमे कुछ अर्थ महान दिखेI अति सीमित शब्द असीमित भाव लिए गणबद्ध विधान दिखेI गुणगौरव हो जिसमे प्रभु का ... Read more