पचास वर्ष से निरंतर लेखन, चार ग़ज़ल संग्रह तथा ग़ज़ल के व्याकरण पर एक पुस्तक प्रकाशित, मेरठ रतन की उपाधि से सम्मानित।

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ग़ज़ल

बदल रही है चमन की फजा पता है क्या। नसीमे सहर का नश्तर कोई चुभा है क्या। फिर इंक़लाब की आहट सुनाई देती है, क़फ़स को लेके परिन्दा कोई ... Read more