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मुक्तक

लगा दे घाव पर मरहम , दिवाना आज है कोई कसकते लब हँसी ला दे , तराना साज है कोई गुमशुदा हो भटकते जो , फिरे आतंक के तम में जुदा रू... Read more

बादल की रेख

भारी बरखा है कहीं , बूँद तरसते लोग सावन का क्या दोष है , सबके अपने जोग सबके अपने जोग , बना चाहे सब राजा ... Read more

गीतिका

आधार छंद वाचिक स्त्रग्विणी – मापनी – 212 212 212 212 समान्त – आने, पदांत – लगी **** खून उबला बहुत रूह जलने लगा यह कलम हाथ की... Read more