पं आलोक पाण्डेय

वाराणसी

Joined January 2017

एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व कवि, लेखक , वैज्ञानिक , दार्शनिक, पर्यावरणविद् एवं पुरातन संस्कृति के संवाहक…..संरक्षक…
प्रधान न्यासी –
संस्कृति शोध संस्थान , भारतभूमि
संकेतक-
स्वराज्य आंदोलन

Books:
भारत भारतीयता की ओर, व्यथा काव्य संकलन , अखंड भारत की ओर ,
भग्न-सत्य , क्रांतिस्फुलिंग

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राष्ट्र के प्राणाधार !

राष्ट्र के प्राणाधार ! शांत सुसभ्य सुशिक्षित शीतल, सभ्य पावनी मनोहारी निश्छल ; दिव्य सभ्यता के, मूर्त्तमान साकार , मेरे महान... Read more

विश्व प्राणाधार को पहचानने में देर क्यों ?

विश्व प्राणाधार को पहचानने में देर क्यों ? सभ्यता के उत्कर्ष को पहचानने में देर क्यों ; उत्कर्ष के व्यवहार को अपना लेने में देर... Read more

देश ढहे जा रहा है !

देश ढहे जा रहा है ! सहस्त्राब्दियों से संवहित एक महान सभ्यता पुकार उठी है- अतीत के ध्वंसावशेषों विघटन-पलायन के भयानक संतापों... Read more

महाप्रलय की गोद जगा दे !

महाप्रलय की गोद जगा दे ! उत्ताल तरंगाघात प्रलयघन सागर की ललकारें , उठे पड़ी सुसुप्त समृद्ध वीरों की हुंकारें ! विशुद्ध धवल प्... Read more

सहृदयता भर दो राम !

हृदयों में संचार शीतलता का सुरम्य कर दो राम , जीवन के सूत्रों में सस्वर सहृदयता भर दो राम ! जीवन वैभव अमर रहे , बाधाओं से ना टकराए... Read more

मर रही जवानियां !

चीर संस्कृतियों का भव्य देश बंजर हो गया है , दग्ध ज्वालों में घिरे , घीस पत्थर हो गया है ! बेहूदे नग्न नर्तन होते नैतिकता के वक्ष ... Read more

विवश राज्य प्रवासी

आज अपने देश में सहमें - दबे , बेसुध जन चले जा रहे हैं ... थके क्लांत ... भूखे व्याकुल ... भयाक्रांत ...! भावनाओं में डूबते-उ... Read more

बबुआ आ जा पुकारे तोहरे गांव हो !

बबुआ आ जा पुकारे तोहरे गांव हो ! नीम की डाली बैठी चिरैयां , चहक-चहक के गावे , शीतल जल में डुबकी लगा के , जीवन सन्देश सुनावे ; ... Read more

मारें ऐसे दांव पसार-डूबे बर्बर जिहादी संसार !

मारें ऐसे दांव पसार-डूबे बर्बर जिहादी संसार ! _________ विषमय मुखों को तोल-तोल , प्रचण्ड शौर्य हुंकारें खोल ; जहां जिहादें चढ़... Read more

उन्मादी थूकलमान !

उन्मादी थूकलमान ! घोर घृणा की आग लगी है , भारत की भाग्य वीथिकाओं में ; मुरझा रही नित कोमल कलियां, भिन्न-भिन्न कलाओं में । डरा स... Read more

कर जाए कंटक प्रस्थान सदा !

देशद्रोहियों की अतिबहुलता को दग्ध सदा कर डालो धीर ; भारत की भाग्य विथिकाओं में, सतत् स्वत्व समेटे गम्भीर ! समर भयंकर भारी है , ले... Read more

पुकारती मां भारती !

पुकारती मां भारती ! हिन्दू साम्राज्य के विपुल ,ध्वंस - परिच्छेद को उघारती , उद्धृत स्मृतियों में विस्तृत भू-भाग को संवारती , नि... Read more

उन्मादों को ध्वस्त सदा कर डालो तुम !

घोर घृणा की आग लगी है , भारत की भाग्य वीथिकाओं में ; मुरझा रही नित कोमल कलियां, भिन्न-भिन्न कलाओं में । डरा सहमा सा जीवन वैभव , ह... Read more

सहमें लोग !

लोग ! सहमें हुए हैं आज ! घरों में , सहसा सशंकित अनायास , भयाक्रांत ! तत्क्षण आभास अनिश्चित सिहरन काल मृत्यु चक्र का , यह सोच... Read more

पग-पग पर होवे पथ प्रशस्त !

पग-पग पर होवे पथ प्रशस्त ! कंपे हिमालय जलधि डोले, रोष की भ्रू भंगिमा में वह्नि बोले ! बहें बयारें हर सान्ध्य प्रहर , जीवन टकरा... Read more

धन्य-धन्य जो धरणी का भार हटाते हैं !

दग्ध ज्वालों को झेल-झेल , विषमय जीवन में खेल-खेल ; तप-त्याग-तेज, प्रचण्ड फैलाकर, दस्यु दल में हा-हाकार उठाकर ! अरि का मस्तक कर व... Read more

बदले खण्डित इतिहास-भूगोल !

मारें ऐसे दांव पसार-डूबे बर्बर जिहादी संसार ! _________ विषमय मुखों को तोल-तोल , प्रचण्ड शौर्य हुंकारें खोल ; जहां जिहादें चढ़... Read more

प्रतिमानों का विध्वंस अधिक नहीं सहो रे !

प्रतिमानों का विध्वंस अधिक नहीं सहो रे ! हे भारत ! प्रतिमानों का विध्वंस अधिक नहीं सहो रे , भग्न संस्कृतियों के ध्वंसावशेष में ,... Read more

वेधे जा हर विषाद !

वेधे जा हर विषाद ! हे भारत के शक्तिपुंज ! धीर-वीर, हे सत्यशोध ! जीवंत सभ्यता के पुण्याधार , सुदीर्घ जीवटता के भाग्यबोध ! तुम ... Read more

प्रणय निवेदन है तुमसे !

प्रणय निवेदन है तुमसे ! प्रणय निवेदन है तुमसे हे प्राण रसिक मेरे आधार ! मधुर हृदयों में आस उमड़ती ; कर लेना प्रियवर स्वीकार !... Read more

जीवन को जीने दो !

जीवन को जीने दो ! ______ अभी बालक है सीखने दो , जीवन को जीने दो ! अभिलाषा का है आकांक्षी , पूरा करो करने दो , जीवन को जीने दो... Read more

दुर्दमनीय तलवारें लिखें !

दुर्दमनीय तलवारें लिखें ! विश्व धरातल पर हुए अक्षम्य, इतिहासों के लिकों को लिखें , मानवता के गहनों के विध्वंसक चीखों को लिखें !... Read more

संघातों में सदा अविचल होना !

संघातों में सदा अविचल होना ! _________ तुम वीरता के दृढ़ प्रतिमान , कभी नहीं धीरज खोना ! कंटक राहें हों दुर्निवार , न भयभीत कही... Read more

सिसक रहा कैसा संसार !

सिसक रहा कैसा संसार ! _______ दाहकता प्रचंड विकराल, विस्मित दिशाएं ‌दग्ध ज्वाल ! आज धुंध दीखता है काला , नदियां दीखती है नाला ।... Read more

जिहादमुक्त विश्व हो अपना !

जिहादमुक्त विश्व अपना ! __________ आओ! आओ ! तुम भी आओ !!! मोमीन ! बरसा लो पत्थर , दिशाहीनता में खूब अकडकर ! आग लगा लो कलियों म... Read more

शत्रु का करना है संहार !

शत्रु का करना है संहार ! __________ हे भारत के कर्णधार ! नवनीत ! सुंदर ! हे सुकुमार ! आज देख देश, कर तनिक विचार, क्या नहीं विलु... Read more

काल-व्यूह से लड़ना होगा !

काल व्यूह से लड़ना होगा ! ____________ यह पुण्य भूमि है ऋषियों की, जहां अभूतपूर्व वीरता त्याग की धार खंडित भारत आज खंड खंड , दे... Read more

धीर शरण्य !

नहीं कहीं कार्पण्य हूं मैं , न हीं गुणों में अग्रगण्य ; हूं केवल उनका शरण्य , धीर-वीर-व्रती वासी अरण्य ! Read more

बन्धुवर अब तो आ जा गांव !

बन्धुवर अब तो आ जा गांव ! खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेती चर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती । आम-पीपल-नीम-बरगद का... Read more

ग्राम कथानक

#ग्राम_की_अविस्मरणीय_गाथा _________ है नमन-वंदन अनन्त #ग्रामवासी सभी प्रबुद्ध जन को, जिनने सींचा इस पुण्य धरा को संस्कार युक्त... Read more

अश्रु नभ को समर्पित करना !

अश्रु नभ को समर्पित करना ! _____ घनीभूत घोर घटाएं छाए नील गगन में, फटे हृदय अविचल हिमगिरि की कम्पन में, विघटन से छिन्न-भिन्न विक... Read more

मांगों वत्स नि:संकोच !

मांगो , वत्स नि:संकोच ! ------------- नीति-नियामक काल-कर्म , विशुद्ध सन्निधिकारक सत्कर्म । मांगो सुहृद स्वच्छ आसन , नीति-नियंता... Read more

हे मेरे राम !

हे मेरे राम ! जन जन के प्रिय नयनाभिराम ! तुम हृदयों में आ जा राम ! तुम आदर्श दिव्य स्वरुप हो भारत के गौरव विश्वरूप हो, तुम... Read more

राम की प्रतिक्षा

#राम_की_प्रतिक्षा _________ देवत्व व असुरत्व के इस द्वंद, वैमनस्य व अंतर्विरोध के बीच प्रकृति, अपने अधिष्ठान पुरुषोत्तम के प्रतिष... Read more

सनातन ज्ञान-विज्ञान पर एक आघात !

सींचित वर्षों से सनातन तप-त्याग से , विराट दया-दान-सत्कर्म-धर्म से ; चिरप्रतिष्ठित काशी का अधिष्ठान , जहां अध्येता-अध्यायी निष्ठा... Read more

करना होगा पथ प्रशस्त !

करना होगा पथ प्रशस्त ! _________ फटे मही-व्योम अंगार मिले , कंपित सागर व्यथित तूफान भले , सर्वत्र झंझावातों के विषबेल खिले; शाश... Read more

धर्मयुद्ध में देना होगा भारी मोल !

कटुओं का उत्पात सर्वत्र , खड़ा प्रलय दावाग्नि भयंकर , झंझावातों से घिरा राष्ट्र , आक्रांत भूधर-पर्वत-सागर ! शुक्र-शोणित-रक्त-मज्ज... Read more

भारतमाता ग्राम्यवन्यविहारिणी

सर्वत्र आलोकित स्फीत ज्वाल, अति दूर क्षितिज पर विटप माल, खग-विहग सस्मित , कलरव विशाल, नहीं काल का कोई चिह्न कराल ! शाश्वत सरस प... Read more

भारतमाता ग्राम्यवन्यविहारिणी

उत्ताल तरंगाघात प्रलयघन गर्जन जलधि क्षण भर, धीर-वीर सौंदर्य गर्वित, खड़ा अविचल हिमगिरि , धीर-धर , शान्त सरोवर विशुद्ध धवल सिमटी है... Read more

भारतमाता ग्राम्यवन्यविहारिणी

मृदुल सुमनोहर गात्र शिशु , करते क्रीड़ांगन धूल में लोट, देख रहा नभ , दिव्य विविधता , अपलक छुपे झुरमुट की ओट, फैला इनके तन का तप, प... Read more

भारतमाता ग्राम्यवन्यविहारिणी

उत्फुल्ल अकंटक भाव-भुवन पुलक-पुर्ण उत्साही, दिशा दीप्त , भय-विस्मय रहित , प्रेम जगती मुसुकाहीं । अधीर हृदय अकिंचन इस तन में, एक अभ... Read more

भारतमाता ग्राम्यवन्यविहारिणी

त्याग तपोमय मधुमय सींचित जीवन शाश्वत निर्भय , दया-दान-सत्कर्म-धर्म , यह ध्रुव सत्य विनिश्चय ! कालकूट का कर आह्वान , अग्निस्फुलिंग ... Read more

अनादि अपौरुषेय

हे तत्त्वदर्शीगण मुनीन्द्र ! अमलात्मा परमहंस , योगिन्द्र ; ब्रह्मात्मका हे ब्रह्मविद्वरिष्ठ ! परात्पर परब्रह्म के ध्यानी करूणा... Read more

बन्धुवर अब तो आ जा गांव !

बंधुवर अब तो आ जा गांव ! खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेती चर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती । आम-पीपल-नीम-बरगद काट... Read more

रुके हो क्यों !

रुके हो क्यों ? अभी तक खोते साम्राज्य, ध्वस्त पताकाएं, खंड-खंड होते स्तम्भ, धुंधली दिशाएं ! नहीं दीख रहा ! दग्ध ज्वालाएं , द... Read more

जन-जन प्रिय रामम्

हे रामम् ! जन-जन प्रिय रंजन, नयन अभिरामम् , परात्पर परब्रह्म परमात्मन् प्रणामम् ! सत्-चित्-आनन्द घट-घट नामं सर्वस्व सन्निहित त्व... Read more

कहीं फटे न व्योम अंगार ...!

नहीं रहा अब न्याय धर्म , संकुचित पीड़ित सत्य विचार , पुण्य धरा हो रही आतंकित आक्रांत, झेल जिहादी बौछार , दिशाहीन भ्रष्ट शासनतंत्र ... Read more

क्या लिखूं

सोचता हूं... लिखूं काव्य चतुर्दिक विधाओं पर मुस्कुराती हर छटाओं पर कल कल जलधारों पर मलय की फुहारों पर टुकड़े-टुकड़ों के धर... Read more

तुम आओ !

तुम आओ ! ________ तुम आओ ! देख पथरीली आंखों का नीर , द्रवित हृदयों में पीड गंभीर ! कालाग्नि की दाहकता से वत्स टकराओ ! तुम... Read more

नेत्र

नेत्र ----------- विस्तृत नेत्रों के तरंग, और होंठो की लाली , दाह सा भरता उमंग लहरों की शीतलता संभाली ! भोली सी सरलता रूप ... Read more