अशोक सोनी
प्रगति नगर ,भिलाई (छ.ग.)
मो. 9406027423 ।
जन्म भूमि- चौरई ,जि. छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
शिक्षा- एम.ए. ( हिंदी , समाजशास्त्र ) बी.टी .
रुचि- अध्ययन ,अध्यापन , लेखन ।
संप्रति- उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्रवक्ता ।
प्रकाशित रचना- धूप की नदी
सम्मान- उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान
राज्य शै.अ.एवं प्र. प. तथा शि.मण्डल द्वारा प्रशिक्षक ,लेखक हेतु चयनित ।

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तुम्हारी प्रतीक्षा

मैंने अपनी पूरी उम्र कैद कर ली है इन आंखों में दिनों की गिनती अर्थहीन लगती है अब मैंने तो बरस के बरस इन आंखों के रास्ते ... Read more

राजनीति में संत हो गए

ईश्वर,अल्लाह,ईसा,नानक एक ही हैंं जब सारे तो जन-मन को ठगने की खातिर कितने सारे पंथ हो गए । लोभी लम्पट भोगी सारे भेष बदल सब हो गए... Read more

एक ग़ज़ल

बीते लम्हों को भी नादान चुराने निकले लोग माज़ी के इस तरह दीवाने निकले । भूलना चाहा जिसे रश्मो रिवाजों की तरह बातों-बातों मेंं कई औ... Read more

एक निर्भीक सच

एक सच अपने पैने नाखून के साथ झूठ की ओर बढ़ता हुआ और उससे बचने के लिए समवेत होता झूठ डैने फड़फड़ाता कभी घेरता कभी भागने को आतु... Read more

नित नए सम्मान लेकर

नित नए सम्मान लेकर नित नए उन्वान लेकर और हम क्या कर रहे हैं खाली जेबें भर रहे हैं । तुम भी ज़रा उत्पात कर लो मन से मन की बात कर ... Read more

फिर मुझे तुम याद करना

गुलमोहर इक प्रीत-सा गुलमोहर मन-मीत-सा जब तेरे आंगन लगाऊं अंजुरी में नीर लेकर सींचती उसको जतन से फिर मुझे तुम याद करना । ... Read more

ग़ज़ल

आदमी को यकबयक क्या सुरूर हो गया, खुद से खुद जाने कैसे वह दूर हो गया । इन्सानियत में इतनी दुश्वारियां तो न थीं, फिर छोड़ने को क्यो... Read more

मन-मीत

मधुऋतु का आनंद भी देखा , देखी पतझर की भी रीत । सावन में झूले की पींगे , और गोरी का सावन गीत । जीवन के इस विकल चक्र में जाने कब-... Read more

गाँव का खत

एक गाँव ने खत लिखा किसी शहर के नाम भाई तुम इतने चर्चित, मैं इतना गुमनाम । पले बढ़े हम एक फिज़ा में देश की हम संतान नहीं पूछ हमारी ... Read more

गिरगिट

एक गिरगिट अचानक रूप बदलने लगा नये-नये रंग में पल-पल ढलने लगा । उसको यों करता देख एक गिरगिट दूसरे से बोला यार !यह अकारण क्यों ... Read more

यादें

वहाँ कौन है तेरा ,तुझको कोई बुलाए क्यूँ । खुद के सताए हैं अगर ,तुझको कोई सताए क्यूँ ।। सारे ज़माने का दर्द उठाने की ताब है । अपन... Read more

धूप की नदी

तुम्हारे और मेरे घर के बीच दोपहर को आज भी बहती है पतली-सी धूप की नदी । किन्तु अब बदल गए हैं, प्रतिबद्धताओं के सारे समीकरण... Read more