Anish Shah

Joined August 2017

अनीश शाह ” अनीश” (अध्यापक)
एम. एस. सी (गणित) बी. एड.
निवास-सांईखेड़ा ,नरसिंहपुर (म.प्र.)
मो. 7898579102
8319681285

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रहा अब नहीं वो ज़माना गया

ग़ज़ल-122 122 122 12 रहा अब नहीं वो ज़माना गया। गये तुम तो मौसम सुहाना गया।। हसीं पल निगाहों में हैं आज भी । तेरा रूठना औ मनान... Read more

जिंदगी हम तुझे जीने निकले

ग़ज़ल जिंदगी हम तुझे जीने निकले। लोग कहते हैं कि पीने निकले।। हो गया फिर से लहू से ही तर। जख़्मे दिल अपना जो सीने निकले।।... Read more

आज बाजार खरीदार पुराने निकले

ग़ज़ल आज बाजार खरीदार पुराने निकले। खोटे सिक्के हैं जो उनके वो चलाने निकले।। अपनी ढपली वो लिये राग सुनाने निकले। कुछ तमाशा... Read more

हम सरेबज़्म यूं गुफ़्तार नहीं कर सकते

ग़ज़ल हम सरेबज़्म यूं गुफ़्तार नहीं कर सकते। अपने रिश्ते को तो अख़बार नहीं कर सकते।। ग़मगुसारी का फक़त तुझको दिया हमने हक़।... Read more

किसी दिलगीर को थोड़ा हँसा देता तो अच्छा था

किसी दिलगीर को थोड़ा हँसा देता तो अच्छा था। किसी की आंख से आंसू चुरा लेता तो अच्छा था।। गुज़ारी बंदिशों में ज़िंदगी तो ये समझ आय... Read more

जेह् न में कैद किया तुझको तज़क्कुर करके

ग़ज़ल - (बह्र-रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ) ज़ेह्न में कैद किया तुझको तज़क्कुर* करके।(स्मरण) अब तो कर लेता हूँ दीदार तसव्वुर* ... Read more

आतिशे इश्क जो जलती है तो जल जाने दे

ग़ज़ल - (बह्र - रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ) आतिशे इश्क जो जलती है तो जल जाने दे। जो हया की है जमी बर्फ़ पिघल जाने दे।। प्यार... Read more

ज़िन्दगी के इम्तिहानों से अगर जो डर गया

: बह्र - रमल मुसम्मन महज़ूफ ग़ज़ल - - जिंदगी के इम्तिहानों से अगर जो डर गया। मौत के आने से पहले ही वो समझो मर गया।। जह्र ये ... Read more

तेरी बातों में सच्चाई नहीं है

ग़ज़ल (बह्र-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ) तेरी बातों में सच्चाई नहीं है। कि मुझमें कुछ भी अच्छाई नहीं है।। यकीं कैसे दिलायेगा तू ख़ुद ... Read more

जब जियादा चढाव होता है

ग़ज़ल - जब जियादा चढाव होता है। रास्तों में घुमाव होता है।। हो ही जाता है दूर लोगों से। तेज जिसका भी भाव होता है।। पेड़ आ... Read more

गीत भॅवरों ने गुनगुनाए हैं

ग़ज़ल- गीत भॅवरों ने गुनगुनाए हैं।। चार सू फूल मुस्कराये हैं।। शम्स(सूरज) ने सर उठाया है ज्यों ही। चाॅद तारें भी मुंह छिपाये ह... Read more

तू सुकूं दिल का मेरे तू ही तो ग़मे दिल है

तू सुकूं दिल का मेरे तू ही तो ग़मे दिल है। तू मसीहा है मेरा और तू ही का़तिल है।। जिस तरफ देखता हूं तेरा ग़ुमां होता है। इस तर... Read more

घर मेरा छीन कर मुझे बेघर तो कर दिया

ग़ज़ल - - घर मेरा छीन कर मुझे बेघर तो कर दिया। अब शुक्रिया तेरा है कलंदर तो कर दिया।। तू हाथ भी न थाम सका डूब जब रहा। एहसान त... Read more

सफ़र अनजान राहों का मुझे कोई तो रहबर दे

बह्र-हज़ज मुसम्मन सालिम ग़ज़ल सफ़र अनजान राहों का मुझे कोई तो रहबर दे। भटकता दर-ब-दर हूं कोई चौखट दे कोई दर दे।। तू अपनी रह... Read more

वो चाहता है उसे मैं भी लाजवाब कहूँ।

बह्र--रमल मुसम्मन मक़बून महज़ूफ ग़ज़ल - 1212 1122 1212 22 वो चाहता है उसे मैं भी लाजवाब कहूँ। किसी चराग़ को कैसे मैं आफताब कहूं... Read more

सारे फ़रेबियों को वफ़ादार कह रहे

बह्र - मज़ारे मक्कूफ मक्कूफ महजूफ ग़ज़ल सारे फ़रेबियों को वफ़ादार कह रहे। जो हैं शरीफ उनको तो मक्कार कह रहे।। वादा निभाया हमन... Read more

और बैचेन हूँ मैं सता कर उसे

ग़ज़ल - बह्र- (मुतदारिक मुसम्मन सालिम) और बैचेन हूँ मैं सता कर उसे । मैं भी रोया बहुत हूँ रुला कर उसे ।। मैं बदलता रहा करव... Read more

किसान हूँ हाँ किसान हूँ मैं

बह्र-मुतक़ारिब मक़बूज असलम ग़ज़ल सितम करो तुम या ज़ुल्म ढाओ, सहूंगा सब बेज़ुबान हूं मैं। मुझे सभी कहते अन्नदाता,किसान हूं हां ... Read more

एक तूफान दिल में मचलने लगा

बह्र-मुतदारिक मुसम्मन सालिम ग़ज़ल एक तूफान दिल में मचलने लगा। यूं लगा जैसे मौसम बदलने लगा।। आपने प्यार से जो निहारा हमें।... Read more

नात ए पाक

नात ए पाक तमन्ना हाज़िरी की एक मुद्दत से है सीने में बुला लीजै मेरे आक़ा मुझे भी अब मदीने में।। बनाते है ग़ुलामों का मुक़द्दर भ... Read more

दिल अगर करने लगे प्यार ग़ज़ल होती है

बहर-रमल मुसम्मन मक़बून महज़ूफ ग़ज़ल दिल अगर करने लगे प्यार ग़ज़ल होती है। ग़म से कोई हो जो बेज़ार ग़ज़ल होती है।। दर्द जब हद ... Read more

शे'र

शे'र कहा उसने कि अपने शे'र का मफ़हूम समझाओ। तो मैं अश्आर लेकर बज़्म से बाहर निकल आया।। ******* ---अनीश शाह ... Read more

बदलेगी किसी दिन तो तक़दीर हमारी भी

ग़ज़ल - (बह्र - - हज़ज मुसम्मन अख़रव मक्फूफ़ मक्फूफ़मुख़न्नक) बदलेगी किसी दिन तो तकदीर हमारी भी। अख़बार में भी होगी तस्वीर हमार... Read more

तभी तो माँ बनाई है

ग़ज़ल - - करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है। तेरा दीदार नामुमकिन तभी तो मांँ बनाई है।। बनाया है अगर वालिद को जन्नत ... Read more

लोग हमको सही नहीं कहते

ग़ज़ल (बह्र - खफीफ़ मुसद्दस मख़बून) लोग हमको सही नहीं कहते। इसलिए तो खरी नहीं कहते।। जो चुभे तंज़ सा किसी को तो। फिर उसे दि... Read more

रदीफ हूँ मैं फ़कत और काफ़िया तू है

ग़ज़ल (बह्र - मुजतस मुसम्मन मकबून महज़ूफ) रदीफ हूँ मैं फ़कत और काफिया तू है। मेरी ग़ज़ल है मुकम्मल जो ज़ाविया तू है।। ये मयक... Read more

अपने दिल के करीब हो कोई

ग़ज़ल (बह्र - ख़फीफ मुसद्दस मख़बून) अपने दिल के करीब हो कोई। एक ऐसा हबीब हो कोई।। जख़्म देकर लगाये ख़ुद मरहम। ऐसा भी तो रकी... Read more

खुशी मिलें कि मिलें ग़म मुझे मलाल नही

ग़ज़ल (बह्र-मुजतस मुशम्मन मख़बून महज़ूफ) खुशी मिले कि मिले ग़म मुझे मलाल नही। ये फैसले है मेरे रब के तो सवाल नही।। हवाए भी... Read more

अभी आया हूँ अपने चाक दामन को रफू करके

ग़ज़ल - (बह्र - हज़ज मुसम्मन सालिम) अभी आया हूं अपने चाक दामन को रफू करके। है छोड़ा मुफ़लिसी ने यूं मुझे बेआबरू करके।। दुखी ख़... Read more

बिषैली सी हवाएं हैं वतन में

ग़ज़ल-(बह्र - हज़ज मुसद्दस महज़ूफ) बिषैली सी हवाएं हैं वतन में। है घोला ज़ह्र यूं गंगो-जमन में।। क़फ़स में ही लगे महफूज़ रहना।... Read more

है शिक्षक ही जो दीपक की तरह दिन रात जलता है

मुसलसल ग़ज़ल बह्र-हजज़ मुसम्मन सालिम है शिक्षक ही जो दीपक की तरह दिन रात जलता है। न जाने कितने सीनों के अँधेरों को निगलता है।। ... Read more

सरे-बाज़ार मैं आराम की बोली लगाता हूँ

ग़ज़ल बह्र-हज़ज मुसम्मन सालिम सरे-बाज़ार में आराम की बोली लगाता हूँ। तभी जाकर कहीं दो वक़्त की रोटी कमाता हूँ।। अंधेरों से र... Read more

मेरा महबूब अपने हाथ में ख़ंजर लिये बैठा

बह्र-हज़ज मुसम्मन सालिम ग़ज़ल मेरा महबूब अपने हाथ में ख़ंजर लिये बैठा। तो मैं भी हाथ में अपने ये अपना सर लिये बैठा।। करूं... Read more

आप यूं ही खराब कहते हैं

बहर्-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून ग़ज़ल आप यूं ही ख़राब कहते हैं।। लोग मुझको नवाब कहते हैं।। ढूढ़ते हो जवाब क्यों मेरा। सब मुझे ल... Read more

घर निगाहों से कहीं तेरी उतर जाऊंगा

बह्र-रमल मुसम्मन मक़बून मसजूफ़ ग़ज़ल गर निगाहों से कहीं तेरी उतर जाऊॅगा। हो गया तेरा जो मुजरिम तो मैं मर जाऊॅगा।। मैं तो बेघर ... Read more

देखा न किसी ने कल ये आज तो अच्छा है।

देखा न किसी ने कल ये आज तो अच्छा है। अंजा़म खुदा जाने आगा़ज तो अच्छा है।। रुतवा भी बढ़ाता है शुहरत भी दिलाता ये। कांटों से भरा ... Read more

ये यार तेरा साथ निभाने का का शुक्रिया

ग़ज़ल (बह्र-मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ मक्फूफ़ महज़ूफ ऐ यार मेरा साथ निभाने का शुक्रिया। दो ग़ज ज़मीन में भी दबाने का शुक्रिय... Read more

यूं मेरी वफ़ाओं का इन'आम दिया तूने

ग़ज़ल - (बह्-हज़ज मुसम्मन अख़रब सालिम) यूं मेरी वफ़ाओं का इन'आम दिया तूने। मैं छोड़ू शहर तेरा पैग़ाम दिया तूने।। क्या इसमें ... Read more

ग़ज़ल हो जाये

बह्र-रमल मुसम्मन मख़बून महजूफ़ 2122 1122 1122 22 मेरे मौला यूं तेरा मुझपे फ़ज़ल हो जाये। मैं अगर लफ़्ज भी छू लू तो ग़ज़ल हो जाये।... Read more

करे वो राज भला कैसे आसमानों में

बह्र-मुजतस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ ग़ज़ल करे वो राज भला कैसे आसमानों में। यक़ीं नहीं है जिसे अपनी ही उड़ानों में।। ये जंग फ़त्... Read more

हिंदू तू हो गया मैं मुसलमान हो गया

बह्र-मजारे अख़रव मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ महजूफ़ वज़्न-221 2121 1221 212 ग़ज़ल हिंदू तू हो गया मैं मुसलमान हो गया। वो आदमी कमाल जो इंस... Read more

पैरों तले मां के ये जन्नत भी बनाई है

ग़ज़ल बह्र-हज़ज मुसम्मन सालिम वज़्न-1222 1222 1222 1222 करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है। तेरा दीदार नामुमकिन तो तूने... Read more

ज़िन्दगी को चला रहा पानी

वज़्न-2122 1212 22 *मुसलसल ग़ज़ल* ज़िंदगी को चला रहा पानी। बेसबब ही बहा दिया पानी।। कैसे जीवन बचेगा बसुधा पर। गर ज़मीं प... Read more

रहबर मार डालेगा

बह्र-हज़ज मुसम्मन सालिम वज्न-1222 1222 1222 1222 ग़ज़ल बड़ा ही कातिलाना हुस्ने दिलबर मार डालेगा। गज़ब ढाता सितम मुझ पर सितमगर ... Read more

तेरे रुख़ का शबाब कहते है

बहर्-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून वज्न- 2122 1212 22 * *ग़ज़ल* * सब जिसे माहताब कहते हैं। तेरे रुख़ का शबाब कहते हैं।। बर्... Read more

ये मेरी संगनी

मापनी--212 212 212 212 जिंदगी है मेरी गर मधुर यामिनी। चांद हूं सिर्फ मैं तुम मेरी चांदनी।। दीप मैं बन सका जब बनी ज्योति तु... Read more

मुझसे ख़फा होकर

ग़ज़ल-(बहर्-हज़ज़ मुसम्मन सालिम) वज्न-1222 1222 1222 1222 अरकान-मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन ... Read more

मुकद्दर यूं बनाया है

ग़ज़ल -- बहर-1222 1222 1222 1222 (1222*4)चार मुफाईलुन (बहर-हज़ज) हमारी प्यास को दो बूंद पानी ने सताया है। तलब ने फिर लबों त... Read more

मैं हूं तुम्हारें आसपास(नब बर्ष ग्रीटिंग)

तुम सोई होगीं,मीठे सपनों में खोई होगीं। उतरेंगी आसमां से नये बर्ष की किरणें, और चूम लेगीं तुम्हारें गालों को। पाकर गर्माहट, तुम घ... Read more

भावान्तरके भाव में उलझा किसान है

मुसल्सल ग़ज़ल - (बह्र - मज़ारे मुसम्मन मक्फूफ़ मक्फूफ़ महज़ूफ) माता बना के तुझको बनाया महान है। धरती माँ देख कितना परेशां किसान... Read more