Amrita Mishra

Bhilai

Joined February 2018

अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत हूँ | अपने इर्द-गिर्द घूमती दुनिया से जो भी प्रवाहित होता है मन के अंदर …उसे पन्नों पर बिखरने की कोशिश करती हूँ… मेरी लिखी कवितायें अमर उजाला और हिंदी प्रतिलिपि साईट पर हैं | बहुत कुछ है मन के अन्दर …जैसे उफान पर हो समंदर … तिल- तिल जलता है दिल ये …. आँखों की बरसात के आगे…..

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मुजरिम तुम.....

मुजरिम तुम..... मुजरिम हो मेरे मन की अदालत में... ऐसा क्यों है कि सम्पूर्ण होकर भी अपूर्ण हूँ मैं, और तुम अपूर्ण होकर भी. ..हो गय... Read more

हर बार छली जाती हूँ......

हर बार छली जाती हूँ...... इस बार हर बार की तरह..... मेरी छुट्टियां यूँ न गुजरने वाली थीं... सालों बाद मिली तुम सब के साथ तुमसब... Read more

मेरा होना....

कई बार कहने को कम.. पड़ जाते है अल्फ़ाज़ मेरे.. और कई बार लबों संग… दिल के तकरार हो जाते ... ज़माना कहता है कि तेरे.. ख्यालों की ... Read more

दर्द की अनुभूति

हर बार ..बारम्बार ...... आज का दिन फिर वही दर्द की अनुभूति.....कहते हैं वक्त अपनी ही गति चलता रहता है ..पर जब ‌..जब ये तारीख आती है ... Read more

ये नववर्ष का उल्लास है कैसा...

हो गयी फिर सुबह... पंछियों ने गाना गाया.. भौंरे की गुनगुन सुन फिर हर फूल मुस्काया... साल बदला कुछ यूं जैसे, बस एक कैलेंडर बदलने... Read more

मेरे बाद का मेरा शहर

मेरे बाद का मेरा शहर... जो मेरी रग -रग में बसा था सालों बाद मेरी नज़र से... जिसमें समावेश है उनसब की बातों की छाप जो कुछ सकारात्म... Read more

आस्था

आस्था स्वयंभू है, स्वयं ही उत्पन्न होती है, कोई बनावट नहीं इसमें, कोई मिलावट भी नहीं इसमें, यह पनपती है जमीन में, किसी खूबस... Read more