अमित निश्छल

देवरिया

Joined February 2018

हिंदी में उन्मुक्त लेखन…

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सूर्य षष्ठी

सूर्य षष्ठी ✒️ गगन से दूर जातीं हे!, किरण सूरज ज़रा ठहरो गमन करतीं सुनो रुककर, दिवस की हारती पहरों; अकिंचन चाँद तारे हैं, सँवरती ... Read more

नवयुग का आगाज़

नवयुग का आगाज़ ✒️ मंद हुआ वासंती झालर, बंद महक, चिड़िया चहकार; बागीचों में, बागानों में, मूक खड़े पादप फ़नकार। द्रवित नेत्र सुंदर पु... Read more

बादल-१६ (रिमझिम के गीत)

बादल-१६ (रिमझिम के गीत) ✒️ इक बार बरस जा, ओ बादल! मैं रिमझिम के गीत सुनाऊँ; सूनेपन से झाँक रहे क्यों? मैं भी तुझे देख ललचाऊँ। ... Read more

पन्नों पर भी पहरे हैं

पन्नों पर भी पहरे हैं ✒️ बैठ चुका हूँ लिखने को कुछ, शब्द दूर ही ठहरे हैं, ज़हन पड़ा है सूना-सूना, पन्नों पर भी पहरे हैं। प्रेम क... Read more

कभी परिमापित नहीं

कभी परिमापित नहीं ✒️ आसमाँ को गर्व है, तारकों की माप पर; एक चंदा है मेरा, कभी परिमापित नहीं। क्या कहोगे बादलों के चक्रवाती दा... Read more

प्रहरी, संवेदनहीन होता है

प्रहरी, संवेदनहीन होता है ✒️ परिधि में प्रविष्ट होते ही गुंजायमान, चंट बादल की चपलता में पाशबद्ध, अमेय निश्छलता संदीप्त, स्वयंभ... Read more

जय विंध्याचल वाली

जय विंध्याचल वाली ✒️ जिसके दर पर ध्यावें मुनि गण, जो वर देने वाली; शमित करो माँ जग की पीड़ा, जय दुर्गे, माँ काली। सृजित किया जब... Read more

अगर पुरानी मम्मी होतीं... - १

अगर पुरानी मम्मी होतीं... - १ ✒️ बैठी सोच रही है मुनिया, मम्मी की फटकार को दुखी बहुत है कल संध्या से, क्या पाती दुत्कार वो? अगर ... Read more

रमुआ के घर में

रमुआ के घर में ✒️ पहुँच चुकी है अंर्तमन तक तथ्यों की इक टोली, आज चित्त में भावों का हड़ताल हुआ है। भूसी नहीं निलय में खाने के... Read more

मौलिकता की उपासना को

मौलिकता की उपासना को ✒️ मौलिकता की उपासना को निर्बंध रखो रचनाकारों, कविताओं के उद्गम के भंडार खोलने वाला हूँ। नैनों की किलकार... Read more

आरोप लगा है आज चाँद पर

आरोप लगा है आज चाँद पर ✒️ आरोप लगा है आज चाँद पर, लड़ी रात की उसे भा गयी। भटका फिरता निरा अकेला कर्तव्यों के मोढ़ों पर रात चढ़े ... Read more

दान-धर्म की महिमा क्या तुम

दान-धर्म की महिमा क्या तुम ✒️ दान-धर्म की महिमा क्या तुम, समझ गये हो दानवीर? अगर नहीं तो आ जाओ अब, संसद के गलियारों में। रणक्ष... Read more

क्या छिपा रखा प्रिये

क्या छिपा रखा प्रिये ✒️ हार जाता हूँ स्वयं ही, शस्त्र सारे डालकर; क्या छिपा रखा प्रिये, इस मधुमयी मुस्कान में? तीव्र बाणों की ... Read more

मिट्टी का पुतला लेकर मैं

मिट्टी का पुतला लेकर मैं ✒️ चमकीली सी इन गलियों में, साक्ष्य जहाँ पर बिकते, माधव! मिट्टी का पुतला लेकर मैं, रो-रो गला फाड़ता आया। ... Read more

चंद प्रीति

चंद प्रीति ✒️ इन आँखों में प्रेयसि मुझको, चाँद नज़र क्यूँ आता है? बियाबान तेरी ज़ुल्फ़ों में, रोड़े क्यों अटकाता है? सूर्यमुखी तुझ... Read more

चाँद, तू गैर है

चाँद, तू गैर है ✒️ चाँद, तू गैर है, जानता हूँ... दिल के ख़्वाबों को सीने में पालता हूँ। एक नज़र तो देखेगा मुझको, तमाम उम्र इस जद्... Read more

आहत ठुमके

आहत ठुमके ✒️ पनघट पर तेरे ठुमकों ने, मरघट से मुझे पुकारा है; कानों में छन से गूँज रही, यह अमर सुधा की प्याला है। बेसुध सा सोता र... Read more

प्रश्नचिह्न

प्रश्नचिह्न ✒️ स्वर्णमयी आभा ज्योतित है, राघव के दरबार में और मानवों ने फैलाई, ख़बर, नगर, घर-बार में; रघुनंदन है श्रेष्ठ सभी से... Read more

प्रेयसि पर मर मिट जाना है

प्रेयसि पर मर मिट जाना है ✒️ मैं नालायक, लोफर भी हूँ तुम देख मुझे मुस्काती हो; पलकों को मीचे, वृहत नैन मुझ पर अपनत्व जनाती हो। ... Read more

क्या छिपा रखा प्रिये

क्या छिपा रखा प्रिये ✒️ हार जाता हूँ स्वयं ही, शस्त्र सारे डालकर; क्या छिपा रखा प्रिये, इस मधुमयी मुस्कान में? तीव्र बाणों की ... Read more

मैंने रातों में चंदा को

मैंने रातों में चंदा को ✒️ सरल हृदय के हर कोने को, नंदन वन महकाते देखा मैंने रातों में चंदा को, हँसकर नीर बहाते देखा। ... Read more

चैत्र का मान

चैत्र मास से पूछा खग ने, मीत कहाँ से तुम आये हो; मग में अपनी नूतनता नित, स्वर्णिम आभा बिखराये हो? या रवि की किरणें अब करतीं, पी... Read more

नाद में मंजीर के बहता रहा

✒️ ऊँघकर, ज्यों बाग में थोड़ा भ्रमर, स्वप्न की रसधार में तिरता रहा; मंजरी की ख़ुश्बुओं में डूबकर, नाद में मंजीर के बहता रहा। फू... Read more

वसंत का स्वागत

बसंती ओढ़कर आया, करो सत्कार तुम रचकर, सजाओ द्वार-चौबारे, पते की बात यह सुनकर; कि लाया सौ टके वाला, मधुप श्रृंगार रस ऐसा, धरा की सा... Read more

मेरे विह्वल परिताप लिये

✒ सतरंगी परिधान लपेटे, वनदेवी तुम बन जाती हो; गिरती बिजली मेरे मन, औ', मंद-मंद तुम मुस्काती हो। मुख प्रसन्न, पर शील झलकता शी... Read more

प्रेयसि पर मर मिट जाना है

✒ मैं नालायक, लोफर भी हूँ तुम देख मुझे मुस्काती हो; पलकों को मीचे, वृहत नैन मुझ पर अपनत्व जनाती हो। जो नैन मिले चुपके से तो ... Read more

चाँद की आभा

✒ शीघ्रता से सूरज भागा ज्यों, निकलकर नीड़ से खोला किवाड़ और आभा लिए दौड़ा झट से टूटकर दो लड़ियाँ, किरणों की गिर गईं जमीन पर छन्न से।... Read more

कवि की निद्रा

✒ यों भूलकर एक सृजक, अपने तन को, कुछ नज़्मों को जिंदा किए जा रहा था; भाल पर नवसृजन, दमक थी छपी यूँ, लफ़्ज़ों को परिंदा किए जा रहा थ... Read more

इक दिया जलाने जाना है

✒ जीर्ण हुआ, चाँद अब नभ में, इक दिया जलाने जाना है; सूझ रहा ना रातों में कुछ, जग रौशन करने जाना है। चाँद का, अस्तित्व जिलाने को... Read more

सरहदों पर चाँदनी

✒ बुझती निगाहें देखती हैं सरहदों पर चाँदनी, सरहदी उन्माद है शीर्ष पर चढ़ा हुआ, जीव एक मृत सा बैठा,बर्फ में सना हुआ, निशि की एक... Read more

मैं कविता बनाता हूँ

✒ मैं कविता बनाता हूँ, लिखता नहीं सजाता हूँ; भावों से, विचारों से सद्बुद्धि से; निर्मोही हो अलगाता हूँ। ख़ुद से जुदा कर, स्वयं... Read more

फागुन है

✒ सरसों फहरें मुरझाय खड़े, किलकारि पड़ें तब फागुन है, पग खेवट के जब झूमि पड़ें, बिनु पान किये सखि फागुन है; जब डूबि पड़े सधवा विरले, ... Read more

ऊँघता चाँद

ऊँघ रहे हो चाँद गगन में, क्या मजबूरी ऐसी? राग अलाप किये बैठे हो, क्या जग है विद्वेषी? इतनी भोली मति है तेरी, उमर रही बचपन की, रात... Read more