पेशे से शिक्षक और प्रवृत्ति से रचनाकार। बौद्धिक-विमर्श में इतिहास का विद्यार्थी और शोधार्थी। भारतीय धर्म और संस्कृति के विभिन्न तत्वों और घटकों के गंभीर अध्येता व तटस्थ समीक्षक।
साहित्य का संस्कार पिता आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ से विरासत में प्राप्त।
हिन्दी-भाषा एवं मातृभाषा की गरिमा की प्रतिष्ठापना हेतु सतत प्रयत्नशील।
सामाजिक समरसता और विश्वमानवाता का प्रबल पक्षधर।
प्रेम-पथ का पथिक। देह को मुक्ति का साधन और साधना का मार्ग मानने वाला दार्शनिक।
अपने युग का प्रतिष्ठित इतिहासकार और चर्चित-लोकप्रिय ग़ज़लकार।
इतिहास और साहित्य-संस्कृति से संबन्धित आठ (8) प्रकाशित पुस्तकों के रचयिता। फिलहाल ग़ज़लों की दुनिया में डूबे हुए शाइर। ग़ज़लों की नयी किताब “धूप का रंग काला है” जल्द ही छपकर आपके सामने आने को तैयार।

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ग़ज़ल

क़ातिल तेरी अदाएँ शातिर वो मुस्कुराना पहलू में है छिपा खंजर वैसे दिल मिलाना कुछ तो मिज़ाज खुद का बाक़ी असर तुम्हारा ऐसे खुशी में... Read more

ग़ज़ल

दुनिया के सब रिश्ते देखे टूटे दिल भी जुड़ते देखे। मन का मैल धुला जब जब भी ठंडे जिस़्म पिघलते देखे। गूँजी मन में शहनाई जब दि... Read more

ग़ज़ल

क्या सुनाऊँ वक़्त ने मुझसे कहा जो हर सितम हर वक़्त अपनों का सहा जो बंद दरिया का मचलना हो गया क्यों पूछता वह मौज में सब दिन बहा ... Read more

ग़ज़ल

जिस्म फ़िर से कुहरता चला जा रहा क्या अँधेरा पसरता चला जा रहा लोग रोते हमेशा मुकद्दर पे जो वक़्त उनका ठहरता चला जा रहा रोशनी क... Read more

ग़ज़ल

क़ातिल तेरी अदाएँ शातिर वो मुस्कुराना पहलू में है छिपा खंजर वैसे दिल मिलाना कुछ तो मिजाज़ अपना बाक़ी असर तुम्हारा ऐसे खुशी में झ... Read more