मैं न ग़ालिब हूँ, न हूँ मैं मीर , ना ही फैज़ हूँ |
मैं “अकेला” हूँ , मिरा अंदाज़ है सबसे ज़ुदा ||

Copy link to share

ख़ुद से दिन रात क्यूँ लड़े कोई।

ख़ुद से दिन रात क्यूँ लड़े कोई। रोज़ ख़ुद क्यूँ मरे जिए कोई।। किन मसाइल का हल नहीं मिलता। ज़िन्दगी तुझसे क्यूँ डरे को... Read more

बात गर सच है तो ताईद का मतलब क्या है।

बात गर सच है तो ताईद का मतलब क्या है। झूठे लोगों से यूँ उम्मीद का मतलब क्या है।। बात कोई भी हो जब फ़र्क़ नहीं है उन पर। फिर उसी बात... Read more

ग़ज़ल- क़त्ल करने आज क़ातिल फिर शहर में आ गया।

क़त्ल करने आज क़ातिल फिर शहर में आ गया। ज़िन्दगी की राह में वो धूप बनकर छा गया।। क्या ख़बर थी लौटकर फिर से वो आएगा यहाँ। ... Read more