लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

स्याँकुरी(धारचूला)

Joined July 2017

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गाँव के दोहे

गाँव के दोहे संगत में जब से पड़ा, सभ्य नगर की गाँव अपना घर वो त्याग कर, चला गैर के ठाँव।१। *** मिलना जुलना बतकही, पनघट पर थी खू... Read more

माली को सिर्फ शूल से

जब से वफा जहाँन में मेरी छली गयी आँखों में डूबने की वो आदत चली गयी।१। नफरत को लोग शान से सर पर बिठा रहे हर बार मुँह पे प्या... Read more

सौदा जो सिर्फ देह का

दिल से निकल के बात निगाहों में आ गयी जैसे हसीना यार की बाहों में आ गयी।१। धड़कन को मेरी आपने रुसवा किया हुजूर कैसे हँसी,... Read more