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प्रकृति
प्रकृति के प्रकोप से सहम गया इन्सां मंज़िल भी पुकारे पर राहें करती हैरां पग-पग आज़माइश है पर न हो परेशां कभी घने कोहरे कभी... Read more
कड़वी सच्चाई लिखूँगी
गरीब की आह लिखूँगी, अमीर की चाह लिखूँगी, आम जनता के लिये राजनेता हैं बेपरवाह लिखूँगी। गरीब का दर्द लिखूँगी, वासना में डूबा मर्द लिखूँगी,... Read more
मेरा शहर.
कि मेरे शहर का हाल मत पूछ मेरे दोस्त, यहाँ तो अब जमीन-ए-शमशान भी महेंगी हो गयी है. जिस पेड़ पर बनाये थे परिन्दों ने... Read more
वक्त
ये तो वक्त -वक्त की बात है कभी मिलता है ,तो कभी मिलाता है कभी खा़मोश सा बैठाता है कभी कहकहे लगवाता है तो कभी... Read more
पत्थरों की कहानियाँ लिख दो
पत्थरों की कहानियाँ लिख दो ख़ुश्क आँखों रवानियाँ लिख दो फ़िर वही तज़करा एे ज़िंदगानी बुढ़ी क़लमों जवानियाँ लिख दो लिख दो तालाब सूखने को... Read more
कविता या कहानी नहीं
kamni Gupta शेर Aug 15, 2016
कैसे कह दूं मैं कोई कहानी। न मैं कोई कवि न मैं कोई ज्ञानी।। चंद लफ्ज़ों में कैसे कह दोगे उसकी ज़िन्दगी कहीं। इन्सान है... Read more
ज़िंदा
Nasir Rao कविता Aug 15, 2016
तुम्हारे जिस्म की खुशबु तुम्हारे लम्स का जादु मेरे अहसास की चादर'' तुम्हारी याद का तकिया मैं जब भी लेके सोता हूँ भले खामोश होता... Read more