गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

II मोहब्बत का जरा खुलकर……II

मोहब्बत का जरा खुलकर सनम इजहार करने दो l
कयामत से कयामत तक मुझे तुम प्यार करने दो ll

चले आओ मेरी जानिब के हो ए फासले कुछ कम l
हसीन इन गेसुओं की छांव में इकरार करने दो II

ए हारा एक सिपाही है मोहब्बत की जहां में पर l
मजा जो हारने में है उसे स्वीकार करने दो II

कहीं खामोशियां तेरी न ले ले जान ही मेरी l
अगर पायल करे खनखन उसे झंकार करने दो ll

तेरी चौखट पे हूं हारा में कारोबार सब अपना l
खुले कुछ बंद दरवाजे मुझे अधिकार करने दो II

तुझे मैं पढ़ सकूं पूरा खुलापन हो किताबों सा l
न हो कुछ भी छुपा मुझमें मुझे अखबार करने दो ll

“सलिल” बातें बहुत सी है करूंगा फिर कभी तुमसे l
अभी बस पास में बैठो मुझे दीदार करने दो II

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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