ग़ज़ल

ग़ज़ल – प्राण शर्मा

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रो रही है तक के अपनी बेबसी को

किनकी नज़रें लग गयी हैं सादगी को

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दुख न हो उसको ये मुमकिन ही नहीं है

देख कर बिगड़ी पुरानी दोस्ती को

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इक गिरे को जो उठा पायी नहीं है

लानतें सौ बार उस मर्दानगी को

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देख लेना सबको भी प्यारी लगेगी

साफ़ – सुथरी रक्खोगे गर ज़िंदगी को

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बाद में होते हैं नफ़रत से कई तंग

पहने ही क्यों `प्राण` वे इस हथकड़ी को

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