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Category: कविता

दिखावा
इंसान दिखावे में परेशान हैं कोई गाड़ी कोई बगला कोई पैसा दिखाने में परेशान है कोई सोना कोई चाँदी कोई हीरा दिखाने में परेशान है... Read more
बेटियाँ
श्रृंगार रस में जब जब सजती हैं बेटियाँ बड़ी नाजुक सी कोमल सी दिखती हैं बेटियाँ वक्त आये तो दुर्गा रुप भी धरती हैं बेटियाँ... Read more
बेटियां..
???वेदना के स्वर तितली के संग??? काश मै तितली होती उडती मदमस्त फिजाओं में इन्द्रधनुषी रंगों में रंगकर रंगती सारे सपनो को सपने जो बुनती... Read more
वेदना के स्वर तितलियों के संग
??वेदना के स्वर तितलियो के संग?? काश मै तितली होती उडती मदमस्त फिजाओं में इन्द्रधनुषी रंगों में रंगकर रंगती सारे सपनो को सपने जो बुनती... Read more
कविता
कर्जदारी कैसी कैसी... मैं कर्जदार था चार दाने भी मयस्सर नहीं थे मुफलिसी में सन्नाटे घर में बसते थे..अब रिश्ते नाते सब लिपट के हँसते... Read more
' ये बेटियाँ '
खुशनसीब होते हैं वो लोग जिनके , घर में मुस्कुराती हैं बेटियाँ । कुछ नहीं ले जाती माँ बाप के घर से, अपनी किस्मत से... Read more
किस्सा--चंद्रहास  क्रमांक--8
***जय हो श्री कृष्ण भगवान की*** ***जय हो श्री नंदलाल जी की*** किस्सा--चंद्रहास क्रमांक--8 वार्ता-- जब धृष्टबुद्धी दिवान लड़के को मरवाने के लिए जल्लाद भेज... Read more
ज़िंदगी
ज़िंदगी फिल्म की तरह बनती है, सँवरती है, बनतीहै, बिगड़ती है, लोग देखते हैं और वक्त के प्रवाह में बहती हुई लावा की तरह ठहरकर... Read more
कविता
हर शाम घर लौटकर आयने में देखकर हमें ही शर्म आने लगें, अपनी आँखों से आँखें मिला न पाएं..... ऐसा क्यूं जियें हम? सूर्य बदल... Read more
जल
जल – पंकज त्रिवेदी * जल बहता है – झरनें बनकर, बहकर लिए अपनी शुद्धता को वन की गहराई को, पेड़, पौधों, बेलों की झूलन... Read more
अशांति
अशांति - पंकज त्रिवेदी तुम्हारा इंतज़ार करना अब नया तो नहीं है बरामदे में झूले पे झूलती हुई मैं शहर से आती उस सड़क को... Read more
मन
मन - पंकज त्रिवेदी ** मन ! ये मन है जो कितना कुछ सोचता है क्या क्या सोचता है और क्या क्या दिखाते हैं हम...... Read more
पैबंद
पैबंद - पंकज त्रिवेदी * बचपन में जब नहलाकर माँ मुझे तैयार करती और फटी सी हाफ पेंट पैबंद लगाकर माँ मुझे स्कूल भेजना चाहती... Read more
मुक्तक
हर एक शब्द को छूने के बाद ही हम उस अर्थ को पाने का भरते हैं जो दम तुम चाहें तुकबंदी कहकर किनारा करो कौन... Read more
माँ
(((((( माँ )))))) ________________________ जब बिन बोले माँ से, कही देर तलक रह जाते है! जब अपने मित्रो के संग कही, मस्ती मे खो जाते... Read more
बेटियाँ
बेटी को जन्म देकर भी माँ माँ ही रहती है बेटी के जन्म पर अक्सर माँ की रुस्वाई होती है। एक बेटी क्या कम थी... Read more
कर्म
Raj Vig कविता Jan 20, 2017
कौन देखता है बार बार यही सोच कर हर बार इन्सान कर लेता है गुनाह कई बार पड़ जाती है जब कर्मो की मार पहुंच... Read more
बेटियाँ
बेटी को जन्म देकर भी माँ माँ ही रहती है बेटी के जन्म पर अक्सर माँ की रुस्वाई होती है। एक बेटी क्या कम थी... Read more
दु:ख का मतलब सुख का जाना।दु:ख को किस प्रकार अभिव्यक्ति मिली है,बताईये ; ------------------------- "दु:ख" ------------------------- ढूँढ लिया मैंने अपना पता, हे,रे सुख! तू जा,... Read more
चुनाव आया
चुनावी परिवेश पर आधारित आप सभी को सादर समर्पित एक नवरचना ------- चुनाव आया, चुनाव आया, चुनाव आया । वोटों के दरिया में , नोंटों... Read more