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मैं विवेक दुबे
निवासी-रायसेन (म.प्र.)
पेशा - दवा व्यवसाय
निर्दलीय प्रकाशन द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से
सम्मान का गौरब पाया
कवि पिता श्री बद्री प्रसाद दुबे "नेहदूत"
से प्रेरणा पा कर कलम थामी
काम के संग फुरसत के पल
कलम का हथियार
ब्लॉग भी लिखता हूँ "कुछ शब्द मेरे " नाम से
vivekdubyji.blogspot.com

All Postsकविता (10)मुक्तक (4)कव्वाली (1)
वो
फैला था दूर तलक वो, कुछ बिखरा बिखरा सा । यादों का सामान लिए , कुछ चिथड़ा चिथड़ा सा । दूर निशा नभ में श्यामल... Read more
पढ़ना लिखना छोड़ दिया मैंने
--पढ़ना लिखना छोड़ा मैंने--- ___________________________ हाँ पढ़ना लिखना छोड़ दिया मैंने पढ़ें लिखों को पीछे छोड़ दिया मैंने बहुत कुछ सीख लिया मैंने बहुत पढ़ा... Read more
आज
शेष नहीं अब आज समर्पण, होता है कुछ शर्तों पर गठबंधन । रिश्ते नाते सूखे तिनकों से , एक चिंगारी से जलता घर आँगन ।... Read more
संग्राम
सिंगर चले सँवर चले । माथे बाँध कफ़न चले । मातृ भूमि के रण बाँके , युद्ध समर संग्राम चले । विश्व शांति के रक्षक... Read more
माँ गंगा
पतित पावनी निर्मल गंगा । मोक्ष दायनी उज्वल गंगा । उतर स्वर्ग आई धरा पर , शिव शीश धारणी माँ गंगा । जैसी तब बहती... Read more
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी को न समझ सकी ज़िन्दगी । बस इस तरह कटती रही ज़िन्दगी ।। करती रही वादे बार बार ज़िन्दगी । अनसुलझी सी रही फिर... Read more
आज
आज सूरज चाँद सा खिला है । आज एक अहसास नया मिला है । है हवाओं में खनक घुंघरुओं की , मदहोशी का एक नशा... Read more
मैं .......
शब्द लुटाता शब्द सजाता मैं । लिखता बस लिखता जाता मैं । खुद से खुद खुश हो जाता मैं । खुद को खुद से झुठलाता... Read more