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*स्वार्थी  मानव*
स्वार्थ मे जन्न्मा स्वार्थी मे पनपा स्वार्थ से उसका नाता है। बिन स्वार्थ के कैसे जीये उसको यह नही भाताहै॥ छुदा के खाती स्वार्थ मे... Read more
मानव  जीव
कहा से आया कैसे आया, यह सोच नही पाता है। पूरी जीवन सोच-सोच के, आँसू वह गिराता है। जब आया वह इस दुनिया में, चिल्लाया... Read more