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श्रीनगर जम्मू-कश्मीर से, धरती के उस हिस्से से जिसे स्वर्ग कहा जाता है. इसी स्वर्ग की वास्तविकता को दर्शाने के लिए "स्वर्ग विराग" काव्य-संग्रह की रचना हुई है, जो चंद्रलोक प्रकाशन कानपुर के प्रकाशित हुआ है.
कब से ढूंढ रहा हूँ खुद को
मुझमें मेरा कुछ भी नहीं हैं.

All Postsकविता (3)गीत (1)
यही स्वर्ग है
ढक रही हैं चोटियाँ... बर्फ़ से, चारों ओर दिख रहा हैं एक मासूम मंज़र हर पाखंड और फरेब से परे ढक रहा है बिखरा खून... Read more
फूलों में बारूद
तुम्हे शोभा नहीं देता कि तुम आंसों बहाओ आँखें फोड़कर तुमने बेच दी नदी चील को और मगरमच्छ को चिनार तीक्ष्ण चोंच और पैनी नज़र... Read more
मुझे खेद है
मुझे खेद है उनके प्रति जिनको कुत्तों से दोस्ती है चील कौओं के जलसों से जो होते है संबोधित, जिनको गीदड़ में दिखता है क्रांति... Read more