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मध्यप्रदेश में सहायक संचालक...आई आई टी रुड़की से पी एच डी...अपने आसपास जो देखती हूँ, जो महसूस करती हूँ उसे कलम के द्वारा अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूँ...पूर्व में 'अदिति कैलाश' उपनाम से भी विचारों की अभिव्यक्ति....

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माँ मेरी मंदिर भी मस्जिद, माँ ही गिरजाघर लगे......माँ के कदमों में मेरे तो देख चारों धाम है
अब नहीं मुझको पता दिन है भला या शाम है आदमी देखो यहाँ हर दूसरा गुमनाम है काम जो करता रहा उस पर उठी ये... Read more
गुलाबों की तरह खिलना कहाँ आसान होता है
गुलाबों की तरह खिलना कहाँ आसान होता है गले काँटों से मिल हँसना कहाँ आसान होता है मिटा देते हैं ये खुद को लुटाने के... Read more
चाय की प्याली कहे कुछ भेज दो अब चिट्ठियाँ
बून्द इक बारिश की देखो आज जो उतरी यहाँ ख्वाहिशें दिल में उठी पूछे सनम तुम हो कहाँ हो गए बेचैन दिन ये ख़्वाब भी... Read more
हर ख़ुशी सबको मिले ऐसी जमीं रब चाहिए
ख्वाहिशें ऐसी कहाँ थी आसमां अब चाहिए लोग हो बेचैन ऐसी जन्नतें कब चाहिए एक दूजे पे भरोसा हो अमन चारों तरफ हर ख़ुशी सबको... Read more
क्या फल और सब्जियाँ भी इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं?
आज अख़बार के पन्ने पलटते-पलटते एक खबर पर ज्यों ही नजर पड़ी, तो नजर हट नहीं पाई…. अरे अरे ज्यादा खुश मत होइए, हमारी नजर... Read more
पापा! मेरे लिए महान तुम्हीं हो!
पुण्यतिथि पर पापा की याद में *********************** थाम के मेरी नन्ही ऊँगली पहला सफ़र आसान बनाया हर एक मुश्किल कदम में पापा तुमको अपने संग... Read more