Skip to content

मूलतः ग्वालियर का होने के कारण सम्पूर्ण शिक्षा वहीँ हुई| लेखापरीक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हुआ|

Share this:
All Postsकविता (44)गज़ल/गीतिका (1)दोहे (3)कुण्डलिया (1)
जीवन प्रवाह
अक्र बक्र दो नदी किनारे बीच बहे जीवन की धारा | गंगा सागर में मिलने तक सुख-दुःख ये ही सहें हमारा | दो कंधों से... Read more
अम्बर पुकारे
गतिशील रहना धरती सिखाये निस्वार्थ सेवा सूरज सिखाये चलती है सृष्टि इन्हीं के सहारे । न सोता है सूरज न थमती है धरती दोनों के... Read more
आल इज वैल
भले भले ही बुरी लगे इतनी बात सही है जो दुखी है या सुखी है ढोता है कर्मों का शैल नथिंग इज़ रॉन्ग, ऑल इज़... Read more
मांं सरस्वती
यमुना प्रेम, भक्ति की गंगा सरस्वती श्रद्धा की धारा प्रेम, भक्ति में देख खोटपन वाणी ने बच किया किनारा | स्वारथ ने संबंध प्रेम के... Read more
लाल बहादुर शास्त्री जी का स्मरण
लाल बहादुर जैसा कर्मठ, भारत माँ का प्यारा पाकिस्तान पराजित करके, खुद किस्मत से हारा दुष्ट पाक की कूट्नीति ने, पलटा जीता पासा रहस्यमयी उनकी... Read more
तुम्हारे बिना
तुम्हारे बिना मन नहीं लगता तुम्हारे साथ रहना मुझे आनंद देता है हर जगह दिन में भी रात में भी । अमेरिका में तुमसे मेरा... Read more
जहाँ न पहुँचे रवि वहां पहुँचे कवि
ऊर्जा के स्रोत रवि तुम, युगधर्म पालक अहर्निश सिखाते जीना जगाना, अज्ञान-तम को दे दविश अन्याय अत्याचार हों जब, न्याय को करके किनारा काल की... Read more
कहकर हर हर गंग
अपनी अपनी विवेचना को कह कर वे सत्संग । तम सागर में हमें डुबाते कहकर हर हर गंग ।। धर्मार्थ प्रयोजित कालाधन करे धर्म बदरंग... Read more
तास के पत्ते
धरती ढीली हो, माटी गीली हो सांस लेने निकल आते, जमीन मे छुपे साँप, बिच्छू, कुकर्मुत्ते लगा लगा छत्ते । धरती कड़ी हो, दरारें भी... Read more
एक स्वप्न
एक तरइया पापी देखे दो दिखें चण्डाल को । तीन तरइयाँ राजा देखे सब दिखें संसार को । होश संभाला जब से मैंने तब से... Read more
विडम्बना
ममता मरी समता मरी अतृप्ति जीवित । मानवी संवेदनाएँ चुक गयीं होकर व्यथित । घर छोड़ती हद तोड़ती गृह लक्ष्मी विश्वास को ठेंगा बताती बन... Read more
गर्मी
सूरज की शहजादी गर्मी, सर्दी निकली घर से निकली मन में जन कल्याण बसाये जल संग्रह करने अषाढ‌ तक तीन माह की सघन साधना रीते... Read more
कुछ दोहे
कविता किरकी कांच जस, हर किरके को मोह । छपने की लोकेषणा, करे छंद से द्रोह । आत्म मुग्ध लेखन हुआ, पकड़ विदेशी छंद ।... Read more
लगे सभी कुर्सी कब्जाने
यहाँ चली है बहस गधों पर कब्रिस्तानों, श्मशानों पर साइकिल- हाथी चिह्नों पर उत्तर-प्रत्युत्तर के चलते प्रजातंत्र के अजब नमूने सभी चले हैं सत्ता छूने... Read more
राजनैतिक विष
कैसे कैसे पागल नेता, कुछ भी कहते रहते हैं । और हम, पिछलग्गू बन, सब कुछ सहते रहते है। होश संभाला जब से हमने, मिला... Read more
मेरा अभिषाप
गीत चल दिये जाओ.... मैं रोक नहीं सकता तुमको पर ध्यान रखो तुम अपराधी हो तुमने मेरे अरमानों का खून किया है आरोपों से मुक्त... Read more