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1978 से प्रिंट मीडिया से जुड़ा हूं। अभी बुलेटिन टूडे में कार्यरत हूं

Hometown: जयपुर
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All Postsकविता (5)गज़ल/गीतिका (9)मुक्तक (1)शेर (2)दोहे (2)कुण्डलिया (1)
क्‍यों है
मुफलिसी में रोटी और भूख में तकरार क्यों है इबादत के लिए मंदिर मस्जिद अलहदा क्यों है सजदा जमीं पर वो देखता आसमान से क्योंं... Read more
बसन्‍त आने से
ये सर्दी भी गुलाबी हो गई बसन्त आने से गर्मी भी अंगडाई ले रही सुप्त अवस्था से पीत रंग धरा धरा ने तेरे बसन्त आने... Read more
शेर
Laxman Singh शेर Jan 17, 2018
हमने टूट कर चाहना चाहा उसे जो चाहा हो गया और टूट गया लक्ष्‍मण सिंह
एक शेर
Laxman Singh शेर Jan 16, 2018
मत पूछ कि कैसे काली रात में उजाला हो गया ये दिल जला और उसके घर में उजाला हो गया लक्ष्‍मण सिंह
कसक ......
वो सर्वोच्च है मेरा सहारा सर्वोच्च है ऐसा ही भान पल रहा था जनता में खम्बा जिस पर न्याय महल टिका हो दरख गया विश्वास... Read more
पतंग
वो लहरा रही थी वो उड़ान भर रही थी दिल पाने को मचल रहा था उसका घर आने का इंतजार था ना जाने कौन उसे... Read more
दोहा
Laxman Singh दोहे Jan 11, 2018
दिल से निकरे दिल में रमे सो लेखनी दिमाग से उपजे चरणन रमे सो भक्ति लक्ष्‍मण सिंह जयपुर
बेटी का मान
चल रहा एक अभियान मेरी बेटी मेरा अभिमान कह रहे नई शुरुआत श्रीमान क्यों हो रहा दिखावे का ज्ञान मेरी बेटी तो मेरा अभिमान उसकी... Read more
दोहा
दिल से निकरे दिल में रमे सो लेखनी दिमाग से उपजे चरणन रमे सो भक्ति लक्ष्‍मण सिंह
मुक्‍तक
दिल में हो अगर आग लगी तो जाहिर ना करना बाहर दिख जाय तो गैरों को आता है हाथ सेखना लक्ष्‍मण सिंह जयपुर
नववर्ष
वर्ष तुम हर बार नववर्ष हो जाते हो अच्छीष बुरी स्मृ ति को इतिहास बना जाते हो नई ऊर्जा का संचार कर स्‍वप्नर दिखा जाते... Read more