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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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"भंडारा"......एक लघु कथा ****************************************************************************************************************** -सामने वाले मंदिर के भगवान साक्षात हैं सेठ जी ! जो भी मन्नत मांगो तुरंत पूरा करते हैं । देखिये ना... Read more
भण्डारा (लघु कथा) ***************************************************************************** सामने वाले मन्दिर के भगवान साक्षात हैं सेठ जी ! जो भी मन्नत मांगो तुरंत पूरा करते हैं । देखिये ना... Read more
**************************** "नाक" **************************** दर्ज़ा होंठों के ऊपर का, अगल-बगल रहती दो आँख , खडी बीच मे बडी शान से, देखो रौब जमाती नाक । किसी-किसी... Read more
हे प्रिये ! अपना कान लाओ तो जरा...
हे प्रिये, ये मेरे हस्ताक्षर की हुईं कुछ खाली चेकें हैं, मेरे बैंक अकाउंट की स्टेटमेंट के साथ, इन्हें तुम इस्तेमाल कर लेना, जब-जब तुम्हारा... Read more
छोटी सी भूल
************************************ छोटी सी भूल ************************************ मैं इक झौंका मस्त पवन का, तू फूलों की शहजादी, मैंने थोड़ी सी हलचल की, तूने खुशबू फैला दी ।... Read more
जी करता है.....
फैला कर बाहें, बिखरे हुए जज्बात को समेट लूं, जी करता है, तुम्हें अंग-अंग में लपेट लूं. बदल दूं फाल्गुनी राग, नई मल्हार जगा दूं,... Read more