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मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं जानता क्या कलम और क्या लेखन! अपितु लिखने का शौक है . शेर, कवितायें, व्यंग, ग़ज़ल,लेख,कहानी, एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लिखता रहता हूँ तज़ुर्बा हो रहा है कोशिश भी जारी है !!

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मुक्तक
गाँव के घरों में अब ताले नज़र आते हैं जंगल के जानवर रखवाले नज़र आते हैं बसर हो रहा है इन सड़ी गलियों का... एक... Read more
सुनो जी
Brijpal Singh लेख Aug 30, 2017
सुनो जी.. लक्ष्मी ने अपने पति रोहित से कहा- अब ऐसा करना क्या ठीक रहेगा, उम्र ढलती जा रही है जैसे सूर्य दिन ढलने के... Read more
लेख
Brijpal Singh लेख Jun 26, 2017
बड़ी बिडंमना है साहब ... सच से क्यों मुँह मोड़ते हैं लोग यहाँ ? मुझे कोई संकोच नहीं कि मैं #उत्तराखंडी हूँ पहाड़ी हूँ और... Read more
ये सच है
कई सरकारें आई और चली भी गई हुआ क्या कुछ भी नहीं ... दाम वहाँ भी महँगे थे और यहाँ भी हुआ क्या कुछ भी... Read more
चंद शेर
Brijpal Singh शेर Jun 22, 2017
बड़ा अज़ीब मिज़ाज़ है इन शहरों का हवा आती नहीं, साँस ले नहीं सकते ... #बृज कभी पास आकर सुन लो मेरे दर्द की आह..... Read more
मुक्तक
आगे बढ़ रहे सभी, वक्त छूटता जा रहा है इंसान ही इंसान को आज लूटता जा रहा है न जाने क्या होगा हस्र और भी... Read more
शेर
Brijpal Singh शेर Jun 22, 2017
कभी पास आकर सुन लो मेरे दर्द की आह.. यूँ मीलों दूर से पूछोगे तो खैरियत ही कहूंगा ...
मुक्तक
प्यार के देखो यहाँ दीवाने बहुत हैं सच है जताने के अफसाने बहुत हैं नहीं करते दिल से कई बात अलग है... अच्छे लोगो के... Read more
एक खत डैड के नाम
डैड... मैं अक्सर सोचता हूं कि आप मुझे छोड़कर क्यों चले गए! आप साथ क्यों नहीं हैं... मैं सोचता हूं कि आज अगर आप मेरे... Read more
मुक्तक
मंत्री साहब आश्वासन दिए जा रहे हैं.. किसान दिनोदिन फाँसी चढ़े जा रहे हैं कहा था साहब अच्छे दिन आएंगे.. लोग भ्रम में आज भी... Read more
बचपन
यादों के साये पसेरे चलना माँ के पल्लू पकड़े कभी शैतानी मनमानी कभी यूँ ..... हठ की आदत हरेक बचपना एकसमान होवे हो जाए गलती... Read more
बसंत
लो फ़िर बसंत आया है छंट गए बादल घनें और यही गज़ब की साया है धरा के रंग हैं बहुतेरे यहाँ गुरु ऋतुओं का नरेंद्र... Read more
मातृभूमि
मातृभूमि में जियूँगा मातृभूमि में मरूंगा मैं कर जाऊँगा न्यौनछावर सबकुछ नही हटूंगा मैं न मिले यश मुझे न मिले सम्‍मान कोई मान रखनें खातिर... Read more
मुक्तक
हकीकत जानकार भी क्यों अंजान हैं सब, जीत गए हैं बाज़ी फ़िर क्यों परेशान है सब, न मिलेगा ये जहाँ यूँ दुबारा किसी को -... Read more
सुनहरे पल
वो हर लम्हा सुनहरा होता है जो अनुरूप हमारे साथ खड़ा होता है न रंग, न रूप न ही भेद कोई समय भी कोई ख़ास... Read more
गज़ल
------------------- ठहरे जीवन को मेरे रवानी मिली गहरे पानी में अब निशानी मिली ------------------- जुस्तजू थी ऐसी तम्मनाएं भी अब जाकर रात सुहानी मिली -------------... Read more
ग़ज़ल
_________________ मेरा दिल मेरा आईना तो दिखा दे घने सन्नाटे में आवाज़ लगा तो दे ----------------- बात ये नहीं कि कौंन कैसा है यहाँ मैं... Read more
अकेलापन
उम्र का ये पड़ाव कैसा है , जहाँ सब कुछ तो है फिर भी अकेलेपन का घाव दिल पे कैसा है ! अपना तो हर... Read more
मज़दूर हूँ ......
मज़दूर हूँ ....... और मज़बूर भी वो दिहाडी और वो कमाई ....... मेरे खाने तक सीमित और ....... कुछ बचाने तक मात्र ताकि कर सकूँ... Read more
वो रात
---------- ज़िंदगी का ज़िंदगानी का भरी भागदौड, आबादी का वो रात ,वो रात...... इस भीड में भला किसे वक्त कौन सुखी, चैन कहाँ हर कोई... Read more
मान जाओ
----------- दिल सच्चा है तो सच्चे दिखोगे यूँ ही हरदम....... बच्चों जैसे अच्छे दिखोगे न द्वेश न कहीं कपट, न घृणा न कहीं भेदभाव बच्चों... Read more
ज़ंग
आशा और निराशा के बीच झूलते-डूबते - उतराते घोर निराशा के क्षण में भी अविरल भाव से लक्ष्य प्राप्ति हेतु आशावान बने रहना बहुत मुश्किल... Read more
नहीं पता
मुझे मंज़िल का नहीं पता मुझे रस्ते का नहीं पता चला जा रहा हूँ बस सुर एक है… मुझे जंगल का नहीं पता मुझे मंगल... Read more