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प्रधान सम्पादिका "नारी तू कल्याणी हिंदी राष्ट्रीय मासिक पत्रिका"

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All Postsकविता (7)गज़ल/गीतिका (3)
रोज़ लिखती हूँ
रोज लिखती हूँ नए छंद नई रुबाई मन के उद्गार और भीगी हुई तन्हाई हूँ कलमकार डुबोती हूँ जब भी खुद को भाव लेती हूँ... Read more
यही है हकीक़त
कहीं झूठ है बेबसी और कहीं लाचारी है भष्टाचारी की थाली में उन्नति बनी बीमारी है लेन देन की बात चली है दुखिया का सर्वस्व... Read more
लो मिलन की रात आई
?मनोरम छंद? लो मिलन की रात आई! प्रेम की बरसात लाई! भीगतें हैँ तन हमारे! साजना तुमको पुकारें! चाँदनी छुपने लगी है! सेज भी सजने... Read more
पगली
?मनोहर छंद? ढाकती थी तन दिवानी! मोल जीवन का न जानी! लोग पत्थर मारते थे! हर समय दुत्कारते थे! रूप नारी का बनाया! बोध तन... Read more