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30 जून 1965 में उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के “सरैया-कायस्थान” गाँव में जन्मे कवि अम्बरीष श्रीवास्तव एक प्रख्यात वास्तुशिल्प अभियंता एवं मूल्यांकक होने के साथ राष्ट्रवादी विचारधारा के कवि हैं। प्राप्त सम्मान व अवार्ड:- राष्ट्रीय अवार्ड "इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी अवार्ड 2007", "अभियंत्रणश्री" सम्मान 2007 तथा "सरस्वती रत्न" सम्मान 2009 आदि | email:ambarishji@gmail.com

All Postsकविता (12)गज़ल/गीतिका (4)मुक्तक (15)गीत (8)दोहे (13)कुण्डलिया (22)
कसम तुम्हें नेता सुभाष की....गीत.
आओ बच्चों सुनो कहानी, अपने हिन्दुस्तान की. नित प्रति होती यहाँ आरती आरक्षण भगवान की. एससी०, एसटी०, ओबीसी० सब, सरकारी दामाद यहाँ और बचें जो... Read more
सहिये इस चाबुक की मार...वीर छंद (आल्हा)
वीर छंद (आल्हा) संविधान में सबको शिक्षा, औ समानता का अधिकार. तब क्यों अगड़े पिछड़े बाँटे, आरक्षण की बहे बयार.. क्रायटेरिया से जो ऊपर, जनरल... Read more
वाह वाह क्या बात....छंद कुण्डलिया.
___________________________________ लड़ते हैं गोमांस पर, भक्षक, श्वान सियार. गिरफ्तार रक्षक करे, भ्रमित वही सरकार? भ्रमित वही सरकार, 'बीफ' दे जिसे सहारा. इसको पशु-बलि मान, नही... Read more
वाह! कमाया नाम.....: छंद कुण्डलिया
________________________________ कुण्डलिया: पेरिस पर हमले किये, वाह! कमाया नाम. इससे कोई मत करे, परिभाषित इस्लाम.. परिभाषित इस्लाम, पहन सेना सी वर्दी. क़त्ल, भले. निर्दोष, कहाँ... Read more
जड़े होठों पर ताले...:शाश्वत कुण्डलिया छंद
बहता क्योंकर अनवरत पक्षपात का द्रव्य. अर्जुन अवसर पा रहा, हाथ मले एकलव्य.. हाथ मले एकलव्य, जड़े होठों पर ताले. किन्तु द्रोंण द्रव पियें मगन... Read more
सॅंभले मानव जाति...कुण्डलिया
ईश्वर से प्रतिभा मिले, सत्संगति से ख्याति. अहंकार उपजे स्वयं, सॅंभले मानव जाति.. सॅंभले मानव जाति, सत्य जीवन का जाने. हो विनम्र दे स्नेह, शत्रु... Read more
छमिया, मुखड़ा तो दिखा...:हास्य-कुण्डलिया
कपड़ा मुँह पर था बँधा. दोपहिया पर नार. छमिया, मुखड़ा तो दिखा, खोल दुपट्टा यार. खोल दुपट्टा यार, आदमी खुलकर बोला. तब विचलित कचनार, सहम... Read more
पति ने पटका देखकर....:हास्य 'कुण्डलिया'
पत्नी घूमे यार सँग, करे प्रेम व्यवहार. पति ने पटका देखकर, प्रेमी को दो बार. प्रेमी को दो बार पटक, शाबासी पायी. मार, घुमाता परनारी... Read more
‘सामने होगा सागर’ ...: छंद कुंडलिया.
सागर खोजा ज्ञान का, किन्तु मिली दो बूँद. उन बूंदों में शिव-शिवा, बैठे आँखें मूँद. बैठे आँखें मूँद, साधकर साधक मन को. बाँटें ज्ञान सहेज,... Read more